मोइदा ओइ दे

मधुच्छंदा चक्रवर्ती
कभी-कभी लगता है कि ज़िन्दगी यूँ ही बिना किसी झंझट के गुज़र जाती तो कितना अच्छा होता। पुरानी यादें जो बार-बार नज़रों के सामने आती हैं वह यह एहसास दिला जाती हैं कि आज जो ज़िन्दगी है या जो हुआ करती थी उसमें से कौन सी सबसे ज़्यादा अच्छी है? क्योंकि आज सबकुछ होते हुए भी लोगों के पास कुछ नहीं है। घड़ियाँ हैं पर वक्त नहीं है, अनाज बहुत है पर भूख नहीं है, लोग बहुत हैं पर रिश्ते कहीं खो से गये हैं। बीते वक्त से चुनकर कुछ एक ऐसी ही घटनाएँ मुझे याद आती हैं।
मैं बारहवीं कक्षा की छात्रा थी। पिताजी के साथ हम सभी अलोंग, अरुणाचल प्रदेश के असम-राइफल्स कैम्पस में रहा करते थे। रोज़ का टाइम-टेबल था—पिताजी नहा-धोकर तैयार होकर असम-राइफल्स स्कूल पढ़ाने चले जाते। पिंकी (मेरी छोटी बहन) भी तैयार होकर पिताजी के साथ स्कूल चली जाती। मैं और भाई आलोक भी तैयार होकर आलोंग हायर सेकेण्डरी स्कूल चले जाते। माँ घर के कामों से फुर्सत पाकर सिलाई के काम में बैठती थीं। उनको सिलाई बहुत अच्छी तरह आती है। क्रोशिये पर जब उनकी उँगलियाँ चलतीं तो इतने सुन्दर-सुन्दर मेज़-पोश बनते, हमारे लिए सुन्दर-सुन्दर स्वेटर बनाती थीं जो देखने लायक होते थे। फ्रॉक तो ऐसे बनती थी जैसे कि रेडीमेड खरीदी हो। हम दोपहर को स्कूल से घर लौटते थे तो माँ के साथ ही भोजन करते थे।
शाम का वक्त खेलने का होता या फिर पढ़ने के लिए बैठ जाते। घर की दिनचर्या हमारी बिल्कुल साधारण सी थी। शाम को पिताजी के पास उनके कई स्टूडेंट पढ़ने आते। हफ्ते में तीन दिन वे दूसरी जगह पढ़ाने भी जाते थे। उनके आने के बाद हम सब अपने-अपने डाउट लेकर बैठ जाते थे, जो ज़्यादातर गणित और विज्ञान के विषयों से संबंधित होते थे। मेरी गणित तथा विज्ञान में कोई विशेष रुचि नहीं थी। कल्पना की दुनिया में उन दिनों उड़ान भरा करती थी। अपने क्वार्टर के आस-पास के दृश्यों को देख-देख कर न जाने क्या-क्या सोचती रहती थी। क्वार्टर के आस-पास के नज़ारे भी तो इतने सुन्दर थे कि क्या कहने! हमारे क्वार्टर का मुख्य दरवाज़ा उत्तर दिशा की ओर खुलता था। बाहर एक बहुत छोटा सा आँगन था, जैसे कि सरकारी और विशेष कर आर्मी बटालियन में रहने वालों के घर होते हैं। वैसे हम जहाँ थे वहाँ गिनती के सिर्फ छः क्वार्टर थे, सभी जाने-पहचाने।
आँगन के दाहिने तरफ खुली बड़ी सी जगह और उसके बाद नर्स अंकल का क्वार्टर पड़ता था। उनके क्वार्टर की तरफ देखने पर दूर पहाड़ी और घने जंगल दिखते थे। यह पूर्व दिशा की ओर था। रोज़ वहाँ से सूर्योदय का नज़ारा दिखता था। पश्चिम की दिशा की ओर उससे भी ऊँचा पहाड़ था। उस पहाड़ में स्थानीय लोगों के घरों तथा तरह-तरह के पेड़-पौधे, केले के पेड़, फूलों की क्यारियाँ तथा गमले और भी न जाने क्या-क्या थे। उनमें सूरज की रोशनी पड़ती थी तो सबकुछ कितने रंगीन हो जाते थे!
आँगन के बाएँ तरफ एक सफ़ेद जबाकुसुम का पौधा था। सावन के महीने तथा अन्य बारिश के दिनों में उसमें बहुत सारे सफ़ेद जबाकुसुम के फूल खिलते थे। साथ ही रेन ग्रास लिली के फूल भी खिलते थे। हम कैम्पस के जिस हिस्से में रहते थे, उस ओर से असम-राइफल्स के कैम्पस से शहर की ओर जाने का रास्ता पड़ता था। मेन गेट के बाहर कई दुकानें थीं। शहर से अक्सर एक बूढ़ी औरत लकड़ियाँ टेकते हुए भीख माँगने आया करती थी। थी तो वह वहीं की स्थानीय, पर हिंदी भाषियों तथा अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोगों के कारण थोड़ी-बहुत हिंदी वह भी सीख गई थी और प्रतिदिन ‘मैदा’ (रोटी बनाने के लिए) की भीख माँगती थी। पर मुँह में दाँत न होने की वजह से स्पष्ट बोल नहीं पाती थी और इशारों से समझाती थी कि उसे खाने के लिए रोटी चाहिए। वह खुद अपने हाथों से रोटी बनाकर खाएगी।
हम उसे भीख देते थे। भिक्षा माँगने पर भीख देना भारतीय परिवारों में बहुत महत्त्व रखता है, खासकर परोपकार की भावना और पुण्य कमाने की लालसा सबसे अधिक होती है। पर जो भी हो, उस बूढ़ी औरत से हफ्ते में दो बार मिलना हो ही जाता था। उसे देखकर यह कभी पता नहीं चलता था कि वह किसी बड़े घर की औरत रही होगी। पोशाक अरुणाचली और चेहरे पर ज़िन्दगी के थपेड़े और तिरस्कार साफ़ पता चलते थे, पर स्वाभिमान की भावना भी उतनी ही प्रबल दिखती थी। दो-एक घर से उसे जितनी भीख मिलती थी, उसके लिए काफ़ी होती थी तो वह वापस लौट जाती थी। मेहनती भी बहुत थी, पर बूढ़ी होने के कारण उसे कोई काम पर नहीं रख सकता था।
ऐसे ही एक दिन की बात है। पहाड़ों पर अक्सर बादल ऐसे घूमते नज़र आते हैं जैसे कि वे बादल नहीं बल्कि कोई इंसान हो। धीरे-धीरे बादलों के झुंड को चीरते हुए लकड़ी टेकते हुए बूढ़ी अम्मा आ रही थीं। उन दिनों खूब बारिश हो रही थी, इसलिए ठंड भी बहुत ज़्यादा थी। बूढ़ी अम्मा के शरीर पर कपड़े तो थे लेकिन वे शायद ठंड से बचने के लिए उतने काफ़ी नहीं थे। वह हमारी लाइन में भीख माँगने आई थीं। एक तो ठंड, उस पर से भूख—कैसी अवस्था होती है, यह तो सिर्फ वही समझ सकती थी। वह आकर अपनी अरुणाचली तथा हिंदी भाषा के मिश्रण में कहने लगी—“मोइदा ओइ दे।” हम सब भी उन्हें मोइदा ओइ दे बूढ़ी ही बुलाते थे। उसकी आवाज़ में भूख की पीड़ा तथा आर्द्रता थी।
हमारे क्वार्टर के बाईं तरफ, जो कि मेन रोड से सटा था, उसमें रहने वाली आँटी ने उन्हें खाने के लिए कुछ दिया। फिर शायद उनसे कुछ कहने को हुईं, लेकिन बूढ़ी अम्मा कुछ न सुनते हुए दोबारा हम सभी के क्वार्टर के सामने आकर भीख माँग रही थीं। जब वह हमारे घर के सामने आईं तो हमने भी अन्नदान दिया, लेकिन मन में न जाने किसी प्रकार का कोई संतोष नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें जब भी मैं देखती तो लगता था कि उनके बारे में सबकुछ जान लूँ। उनका किचमिचाया हुआ चेहरा, दाँत के नाम पर केवल दो ही बचे हैं, सिर पर एक कपड़ा पगड़ी के जैसे बाँधे रहती थीं। पहाड़ी स्त्रियों के सिर पर कपड़ा माल ढोने तथा पहाड़ी ठंडक से बचने के लिए होता है, परन्तु यही कपड़ा उनकी पोशाक को और भी सुन्दर और विशेष बना देता है। हमारी मोइदा ओइ दे की पोशाक भी ऐसी ही थी, बस एक ही फ़र्क था कि कई पुराने मैले-कुचले कपड़े एक साथ पहने रखे थे उन्होंने। पहाड़ी रास्तों पर लगातार चलने की थकावट सबकुछ जैसे उन्हें अंदर से बहुत दुर्बल और दुखी कर रहा था। पर एक चीज़ थी—जब भी कोई उन्हें भीख देता तो वह उसे खुशी से आशीर्वाद ज़रूर देती थी। यह सब देखकर कभी-कभी सोचती कि विधाता की यह कैसी लीला है कि जिस उम्र में उन्हें घर में आराम से रहना था, वह भिक्षा माँगकर अपना जीवन बिता रही हैं। भारत में वैसे भी भिक्षुओं की कमी नहीं है, परन्तु वृद्धावस्था में किसी को भीख माँगते देख कुछ ज़्यादा ही अजीब लगता है।
एक दिन मैंने हमारे पास के क्वार्टर के एक अंकल से यूँ ही इन बूढ़ी अम्मा के बारे में पूछ लिया था। तो पता चला कि आलोंग टाउन के ये कभी सबसे अमीर परिवार से हुआ करती थीं। इनके चार-चार बेटे हैं, बड़ा घर है, गाड़ियाँ हैं। फिर एक दिन इनके पति ने किसी दूसरी महिला से शादी कर ली और इन्हें घर से निकाल दिया था। तब से ये भीख माँगकर अपना जीवन गुज़ार रही हैं। बस इतना ही पता है उनके बारे में, लेकिन जो भी हो, उनको देखे बिना चैन नहीं आता था। हर हफ्ते न सही, पर हर महीने का यही क्रम था। पर कभी-कभी सोचती थी कि एक बार कभी मौका मिले तो उन्हें पेट भर कर भोजन करता ज़रूर देखूँ।
विधाता ने हमें यह मौका भी दिया। हमारी दादी माँ गुज़र चुकी थीं। हर साल पिताजी घर पर उनकी बरसी मनाते थे और पूजा करते थे। सिलेठी परिवारों में एक रिवाज यह है कि दादी या नानी का यदि देहांत हो तो उनके पोते या नाती द्वारा उनके श्राद्ध के समय पर एक छाता देना पड़ता है ताकि दिवंगत को स्वर्ग जाने में कोई कठिनाई न हो। उस दिन घर में जब पूजा हो रही थी तो यही बूढ़ी अम्मा संयोग से भीख माँगने आई। माँ ने उस दिन शुद्ध निरामिश भोजन बनाया था। पूजा लगभग समाप्त होने को आई थी। हमने बूढ़ी अम्मा को रोक लिया। वह भीख माँगने कहीं और जाना चाहती थी, लेकिन हमने उन्हें किसी तरह अपने घर पर रोक लिया। फिर पूजा समाप्त होते ही उन्हें केले के पत्ते पर भोजन परोसा। उन्होंने इतना सारा भोजन कई शायद दिनों बाद देखा था, शायद इसीलिए वह इतना भोजन नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने जितना भोजन करना था, सो किया, लेकिन बाक़ी का उन्होंने अपनी थैली में भर लेना चाहा था। बेचारी क्या करती? कपड़े की मैली सी थैली में क्या-क्या भरती!
फिर हमने किसी तरह उन्हें कुछ डिब्बों में भरकर भोजन बाँध दिया। उसके बाद मुझे अचानक ख्याल आया कि मेरा एक पुराना सलवार-सूट है जो मैं अब नहीं पहनती। मैंने उन्हें ले जाकर दिया तो उन्होंने उसे तुरंत पहन लिया। अपने बाक़ी मैले कपड़ों के ऊपर उस पुराने कुर्ते को पहनकर भी वह बहुत खुश हुईं। आलोक ने उन्हें छाता भी दिया। उन्होंने ये सारी चीज़ें खुशी-खुशी ले लीं। उसके बाद वह कई बार हमारे यहाँ भीख माँगने आती रहीं। शायद उन्हें यह लगता रहा होगा कि हम उन्हें खाने के लिए कुछ-न-कुछ देंगे, पर रोज़-रोज हमारे लिए भी यह संभव नहीं हो पाता था, क्योंकि हम सभी घर से बाहर रहते थे और माँ घर के काम में व्यस्त या फिर क्वार्टर के पीछे बने बागान में सब्जियों के पौधों में पानी डाल रही होती थीं। इसलिए जब संभव होता, उन्हें खाने के लिए हर रोज़ कोई-न-कोई कुछ-न-कुछ ज़रूर दे देता था।
पर बहुत दिनों तक यह सिलसिला भी नहीं चला। दादी माँ की बरसी वाले दिन के बाद कुछ दिनों तक वे दिखीं, पर उसके बाद फिर वे हमें नहीं दिखीं। विधाता जाने क्या हुआ? हमारी मोइदा ओइ दे बूढ़ी से दोबारा मुलाकात नहीं हुई, पर दादी माँ की बरसी के दिन जो अच्छे से मिले थे, उतना आज तक याद है।
यह स्मृति कथा 1999-2000 के समय की है। अतः प्रकृति के नियम के अनुसार शायद वह अब इस लोक में नहीं है। प्रार्थना करती हूँ कि जहाँ भी वह रहे, ईश्वर उनको शांति दे।
डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती
