प्रभा दीक्षित का साक्षात्कार
प्रभा दीक्षित से राजीव कुमार झा की बातचीत
कानपुर की लेखिका प्रभा दीक्षित से राजीव कुमार झा की बातचीत...
" हिंदी ग़ज़ल ने यथार्थ और क्रांति का रास्ता चुना और यही उसकी समकालीन प्रासंगिकता है!"
प्रश्न: आपने नवगीत लेखन भी किया है। इसके अलावा अन्य काव्य रूपों में भी आपकी दिलचस्पी रही है!
अपने काव्य लेखन को किस तरह से देखना चाहेंगी?
उत्तर:मैं एक प्रतिबद्ध रचनाकार हूं। मेरे लिए विधा से ज्यादा
से ज्यादा विषय महत्वपूर्ण है।
इसी कारण मैंने गीत नवगीत गजल मुक्त छंद सभी विधाओं में काव्य लेखन किया है यह रचनाकार की अपनी पसंद हो सकती है कि वह किस विधा में लिखें।
जब हमारे समकालीन रचनाकारों को यह लगा की छायावादी गीत वर्तमान समय की विसंगतियों को अभिव्यक्त करने में असफल हो रहे हैं तब उन्होंने समकालीन कविता और नवगीतों की रचना करके हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। पूर्ण रूप से या नहीं कहा जा सकता कि नवगीत लेखन नहीं किया जा रहा है। डॉ राधेश्याम बंधु जी ने नवगीत के क्षेत्र में काफी काम किया है उन्होंने नवगीतकारों के गीतों का संचयन और विमर्श को एकीकृत कर तीन वॉल्यूम में संपादित और प्रकाशित करके भी इस विधा को नई ऊंचाइयां दी है। मेरा भी दो नवगीत संग्रह गौरैया धूप की, एक कविता हाथ मलती रह गई प्रकाशित हो चुके हैं और सूरज की बात नाम से एक नया नवगीत संग्रह शीघ्र प्रकाशय है। नवगीतों की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी युगीन प्रासंगिकता , लोकजीवन से जुड़ाव भाषाई रूढ़िवादिता से मुक्ति ।
मेरे नवगीत
दो पंछी डाल के
रख लेना गीत में संभाल के
दो पंछी डाल के।
फिक्र नहीं दुनिया की
देशों की गांवों की
रोटी की पानी की
रोज के अभावों की।
हर पल को जीते हैं
हवा में उछाल के
मुक्त प्यार की भाषा
मौन रही अभिलाषा
तृप्ति लिए घूम रहा
जीवन प्यासा प्यासा
मादक स्पर्श बोध
देह के रुमाल के।
धरा गगन की उड़ान
अपना सारा जहांन
पा करके डूब गए
पेड़ों वाले मचान।
कविता ने चुरा लिए
भाव कुछ कमाल के।
दो पंछी डाल के
नवगीत (२)
गांव की लड़कियां
शहरों में कस्बों में पढ़ती है
गांवों की लड़कियां।
साइकिल चलाती हैं
पैदल भी चलती है
लौटती दोपहरी में
बस में भी जलती है।
भीड़ भरी सड़कों की
आवारा लड़कों की
आंखों में गड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।
संस्कार जीती है
पली है अभावो में
हाथों में हथकड़ियां
बेड़ी है पावों में
खेत की कमाई से
बाप की समाई तक
स्वयं को जकड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।
घर के सब कामकाज
कपड़े भी धोती है
अधरो की मुस्काने
कई बार रोती है
कोर्स कहां पूरा है
स्वप्न भी अधूरा है
खुद से ही लड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।
अधूरी शिक्षा पाकर
मौन रह कराहेगी
इम्तिहान के पहले
जब ब्याही जाएगी
भैया प्रतिरोधी है
पति भी विरोधी है
कहो कब झगड़ती है
गांवों की लड़कियां।
प्रश्न:हिंदी ग़ज़ल की प्रमुख विशेषता के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर:दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी गजल ने अपने अलग तेवर अपनाए। इश्क और मोहब्बत के बारे में उर्दू में बहुत कुछ कहा जा चुका था साहित्य समाज का दर्पण होता है इस सिद्धांत के अनुसार भी हिंदी गजल ने यथार्थ और क्रांति का रास्ता चुना और यही उसकी समकालीन प्रासंगिकता है।
प्रश्न:आजकल दलित लेखन काफी ज़ोर पकड़ रहा है? इसके बारे अपने विचारों से अवगत कराएं?
उत्तर:दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श यह हमारे समाज के संघर्ष और अंतर विरोधों का आईना है । परंपरागत चिंतन में यदि कुछ कमी होती ना होती तो आधुनिक समकालीन चिंतन कैसे पांव जमा सकता था।
प्रश्न: आपने मुक्तिबोध और नागार्जुन इन दोनों ही लेखकों के साहित्यिक अवदान पर लेखन किया है। इनके बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर :मुक्तिबोध एवं नागार्जुन दोनों ही हिंदी साहित्य के कालजयी हस्ताक्षर है इनका सबसे बड़ा साहित्यिक अवदान यही है कि इन्होंने नई कविता आंदोलन के भटकाव भरे रास्ते के बीच प्रगतिशील अवधारणाओं को साहित्य में पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया साहित्य को लोकजीवन से समकालीनता से जोड़ने में सफल रहे। केवल यथार्थ ही नहीं बल्कि यथार्थ के बदलाव का भी उनका संकल्प महत्वपूर्ण है।
प्रश्न: आप कहां की हैं और अपनी शिक्षा दीक्षा के बारे जानकारी दीजिए।
उत्तर:मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद में पैदा हुई मेरी आरंभिक शिक्षा दीक्षा रायबरेली में ही हुई बाद में मैंने प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से संस्कृत विषय से परास्नातक की डिग्री ली। 1984 में विवाह के बाद कानपुर नगर में जुहारी देवी गर्ल्स कॉलेज कानपुर से हिंदी से एम .ए . औरर पीएचडी हिंदी में की उपाधियां ली। अपने मायके में मैं छह भाई - बहनों में सबसे बड़ी थी और पढ़ने में काफी अच्छी थी। छात्र जीवन से ही मैंने अपने लेखन की शुरुआत की थी।
प्रश्न: आप लघुकथा लेखन भी करती रही हैं। इसके बारे में बताइए।
उत्तर :आज के व्यस्त जीवन में साहित्यकारों को छोड़कर आम आदमी को लंबी-लंबी कहानी और उपन्यास पढ़ने में प्रायः रुचि नहीं होती है। इसलिए लघुकथा की प्रासंगिकता बढ़ती जाएगी। इस विधा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बड़े ही संक्षिप्त रूप में पाठकों को आह्लादित और प्रेरित करने में समर्थ होती है।
प्रश्न:जन संस्कृति मंच से आप का जुड़ाव कैसे हुआ?
उत्तर:मैं इलाहाबाद में
सरोजिनी नायडू छात्रावास में रहते हुए जन संस्कृति मंच से जुड़ी और विवाहोपरांत मैंने कानपुरी इकाई का भी गठन कमल किशोर श्रमिक के साथ मिलकर किया था । और इसकी राष्ट्रीय प्रादेशिक इकाई से भी जुड़ी हूँ। आज भी मेरा इससे जुड़ाव है। जनवादी लेखक संघ व प्रगतिशील लेखक संघ के साथ मिलकर हम संयुक्त आयोजन भी करते हैं । यदि वर्तमान में स्वास्थ्य कारणों से पहले जैसी सक्रियता नहीं रह गई है। फिर भी पुस्तक लोकार्पण व समीक्षा वह अन्य सेमिनारों में थोड़ी - बहुत भागीदारी अभी कर लेती हूं। प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मेलन में भी हम सम्मिलित होते हैं।

