जयपुर की लेखिका:इंदिरा प्रबुद्ध शर्मा

राजीव कुमार झा
साहित्य:साक्षात्कार
जयपुर की कवयित्री इंदिरा प्रबुद्ध शर्मा से राजीव कुमार झा की बातचीत।
प्रश्न - अपनी काव्य संवेदना और अनुभूति के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर -मेरी कविताएं अधिकांशत समसामयिक घटनाओं पर प्रकाश डालती हैं।इसके अलावा देश, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति,समाज, आध्यात्मिक भजन,त्यौंहार आदि से ओतप्रोत विषयों को अपनी रचनाओं को स्थान दिया है। इनके अतिरिक्त कुछ कविताएं जो किसी समय सीमा में नहीं बल्कि मानव जीवन और भावनात्मक विचारों की प्रेरक हैं।जैसे "शाश्वत सत्य" और "सरहद"।
प्रश्न - फेसबुक पर भी आप कविता लेखन करती रही हैं?
उत्तर -: फेसबुक आजकल हर प्रकार के घटनाक्रम पर अपने पक्ष -विपक्ष दोनों ही तरह के विचारोंको रखने का मंच बन गया है। मैं भी अपनी कविता के माध्यम से विचार व्यक्त करती हूँ।"युद्ध की विभीषिका" में आज की वैश्विक स्थिति का वर्णन है,वहीं "विवाह/टूटते रिश्ते" में शादी के प्रति युवक-युवतियों में बढ़ती उदासीन भाव और दाम्पत्य जीवन कोन निभा पाने की स्थिति का चित्रण किया है।"आखिर क्यों" बिल्कुल नई कविता है,जिमें आजकल बहुतायत में होने वाली घटना ,जिसमें मुख्य तौर पर नवविवाहित या सगाई के बाद जीवन साथी पर हमले, घटते संस्कार और पाश्चात्य संस्कृति के प्रति युवा पीढ़ी के झुकाव पर अवगत कराया गया है।
प्रश्न - साहित्य सृजन के प्रति अपने मन में कायम होने वाले झुकाव के बारे में बताइए।
उत्तर:इस विचार से मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि कोई भी कला या भाव जो स्व-प्रेरित और प्राकृतिक रूप से हमारे हृदय में निहित हैं, उन्हें समय,आयु या किसी भी स्थिति में हम मन से नहीं निकाल सकते। मैं स्वयं विद्यार्थी जीवन से काव्य लेखन के प्रति सहज भाव से झुकाव महसूस करती रही हूँ। शाश्वत और सहज भाव से उत्पन्न काव्यात्मक रुचि को उम्र के किसी भी पड़ाव पर पूर्ण किया जा सकता है।
प्रश्न - अपने घर परिवार माता - पिता और शिक्षा दीक्षा के बारे में बताइए।
उत्तर - मेरे पिताजी आयुर्वेदिक वैद्य के पद पर ग्रामीण परिवेश में कार्यरत रहे।अतः अपने भाइयों के साथ उच्च प्राथमिक शिक्षा वहीं प्राप्त की। तत्पश्चात स्नातक की डिग्री के लिए अलवर रहने लगी। बचपन में हमारे परिवार में सायंकालीन आरती के बाद मंत्र,श्लोक और भजन-कीर्तन नियमित रूप से होते थे।यहीं से काव्य के मूल भाव लय,ताल और संगीतात्मक वाक्य बनाने की प्रेरणा मिली। सन् 1987 में श्री प्रबुद्ध कुमार शर्मा निवासी जयपुर (रिटायर्ड प्रिन्सिपल राजस्थान सरकार)के साथ वैवाहिक बंधन में बंध गई। 1993 में राजनीतिक विज्ञान से और 1998 में हिन्दी से स्नातकोत्तर की डिग्रियाँ प्राप्त की। एक पुत्री व एक पुत्र की शिक्षा का ध्यान रखते हुए लगभग 8 वर्ष निजी विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया है। एक वर्ष से मैं लेखन क्षेत्र में क्रियाशील हूँ। 'भाव गंगा' 18 कविताओं और 6 क्षणिकाओं काव्य संकलन है। देहरादून निवासी (मेरे समधीजी और समधन जी) श्रीमती मोनिका जी और श्रीमान अनिल शर्मा जी के प्रोत्साहित करने और विमोचन के स्तर तक पहुँचाने लिए कृतज्ञ हूँ।
अलग-अलग भाव जैसे "शिव और सावन" नवरात्र "भजन" "दीपावली" भक्तिभाव, "वट-वृक्ष" मात-पिता को समर्पित रचना हैं।
"किरच से सृजन","हार का डर" " स्वप्न और दायित्व" ,"शाश्वत सत्य" आदि जीवन मूल्य को समझने और बाधाओं से लड़कर निरंतर आगे बढ़ने की राह दिखाती हैं। "स्वदेशी पर गर्व","सरहद","हिन्दी दिवस ",मेरा देश, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताए हैं।
प्राकृतिक आपदा पर लिखित "प्रकृति का प्रतिशोध "(धराली)से
"पावस ऋतु अब लगी डराने,
जल बरसाए घटा जब काली।
नदियाँ तोड़ किनारे चल दीं,
बहा ले गई गाँव 'धराली'।।"
और
'हे ईश्वर अब बस कर' से
"अफगानी धरती काँपी है,
सहकर भीषण ज़लज़ला।
पंजाबी वीरे अटल खडे,
दिखला रहे चढ़दी कलां।।"
आदि इस संकलन की मुख्य कविताए हैं।
5 नवम्बर 2025 को देहरादून के थाना गाँव स्थित "लेखक गाँव" में (अंतर्राष्ट्रीय कला ,संस्कृति और साहित्य महोत्सव) में पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड, पूर्व मानव संसाधन मंत्री केन्द्र सरकार "श्री रमेश पोखरियाल निशंक " जी के द्वारा विमोचन किया गया है।
प्रश्न - कविता लेखन के अलावा अपनी अन्य प्रकार की अभिरुचि के बारे में बताइए।
उत्तर - काव्य लेखन के अतिरिक्त मुझे वर्ग पहेली (क्रासवर्ड पज़ल ) भरना बहुत अच्छा लगता है। प्रातःकालीन समाचारपत्र लेकर सबसे पहले पहेली भर्ती हूँ, उसके बाद समाचार पढ़ती हूँ।थोड़ा-बहुत शौक बागवानी का भी है। इंग्लिश स्क्रेबल,और वर्डल जैसे दिमागी कसरत वाले गेम्स भी बहुत तन्मय होकर खेलती हूँ।

