साहित्य सृजन संवाद

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साक्षात्कार

डॉ ऊषा टिबड़ेवाल का साक्षात्कार

साहित्य: साक्षात्कार चेन्नई की कवयित्री डाॅ उषा टिबड़ेवाल से राजीव कुमार झा की बातचीत... प्रश्न- कविता से मेरा जुड़ाव कैसे हुआ? उत्तर - बचपन से लिखने का बहुत शौक था, पर पहले माँ बाप के घर में रोकते थे और फिर शादी हुई तो ससुराल के जिम्मेदारी और पतिदेव और लोगों को न पसंद आना मेरी शायरी लिखना। उसके बाद जिंदगी में एक बड़ी ट्राजिटी हुई जीवनसाथी का साथ छूटना, टूट बिखर गई थी। जीने को कोई मकसद भी नहीं बचा क्योंकि सब जिम्मेदारियों से भी मुक्त हो चुकी थी। और सरस्वती माँ की कृपा से हाथों में कलम का आना उस समय कमज़ोर, बेनजान जिंदगी को, कलम ने जान डाल, मेरी ताकत बनी, फिर सब जिम्मेदारियों से भी मुक्त हो चुकी थी, तो लगा कि चलो कलम को जीवनसाथी बना, कुछ ऐसा लिखा जाए कि मेरी कविता किसी के जीवन में दुख-दर्द हट सुख बने तब लिखती चली गई और लिखने में मुझे बहुत सुकून भी मिलता है। और लोगों को पढ़ने में अच्छा लगता है,अब ये जीने का आनंद अलग हो गया। किसी और के लिए जीना ही मेरा जीवन का मकसद बन गया। कलम, मेरी ताकत जीवन मेरी किताब बस अपनी जीवनी लिखी तो कभी किसी की जीवन उतारी, इसी के लिए यह मेरी कविता का मकसद मेरा जीवन बन गया। आप कविता के गुण धर्म के बारे में क्या कहना चाहेंगी? *प्रश्न - इसका मूल भाव क्या है*? *अपनी कविता में प्रवाहित अनुभूतियों के बारे में बताइए*? *कविता के गुण-धर्म क्या हैं?* उत्तर - मेरे लिए कविता के कई प्राण तत्व हैं: - *सत्य* - जो दिल में है वही शब्द बने। दिखावा नहीं, बनावट नहीं *संवेदना* - कविता पढ़कर आँख भीग जाए या दुखी मन खुशी हो जाए, नई आशा जग जाए, खुशी से जीने का बहुत बड़ा सार है - *लय और बिम्ब* - शब्दों में संगीत हो। "सावन झूम झूम गाया" जैसी पंक्ति अपने आप झूले पर बैठा दे। महसूस कराए कि कुछ असलियत में चल रहा हो, सपनों का आभास सच लगने लगा है। - *सार्वभौमिकता* - एक की कहानी कई लोगों की एक सी कहानी लगती है, "अनकहा पहला प्यार" सिर्फ आपका न रहे, कविता केवल लिखी नहीं जाती, वो हर तरह का आईना दिखाती है। *प्रश्न - आपकी कविता का मूल भाव क्या है?* उत्तर - एक ही शब्द में कहूं तो - *" हर दुख सुख की अनुभूति को भाषा देना"* दर्द हो तो आँसू शब्द बनकर उतर जाना, खुशी हो तो स्वर गीत बनकर गाना, प्रेम हो तो खामोशी बनकर, और देश हो तो शंखनाद बनकर बहना। कविता का मूल भाव इंसान के दिल की भावना को जोड़ना है। बूँद से सावन तक, और सावन से देश तक हर कहानी शब्दों में, पीरो कवि में उतरता है। प्रश्न - आपकी कविता में कौन सी अनुभूतियाँ बहती हैं? उत्तर - सचमुच जब मैं जब लिखती हूं तो तीन धाराएं एक साथ बहती हैं: 1. *"अनकहा" का दर्द* - जैसे "ये बूँद और तुम" में। वो प्यार जो कहा नहीं गया, पर हर बारिश में कहा गया। एक मीठा इंतज़ार, एक खामोश इबादत। 2. *"प्रकृति से रिश्ता"* - सावन, बूँद, मिट्टी, हवा। मेरे लिए प्रकृति गवाह है। वो हमारे जज़्बातों को अपने में सहेज लेती है। इसलिए सावन आते ही प्रेम जाग जाता है। 3. *"गर्व और समर्पण"* - जैसे "कारगिल की चोटियों पर" में। जहां एक तरफ निजी प्रेम है, वहीं दूसरी तरफ देश-प्रेम। दोनों में त्याग है। एक में दिल दिया, दूसरे में जान दी। मैं शब्दों से खेलती नहीं हूँ, मैं कोशिश करती हूं कि जो आप महसूस करते हैं, उसे ही कागज पर उतार दूं। ताकि पढ़कर आप कहें - "हां, यही था मेरे मन में"। मन में भाव पैदा होते हैं तो कविता अपने ही भाव में शब्दों के रूप में बहने लग जाता है। *प्रश्न - अपने घर परिवार माता - पिता और शिक्षा दीक्षा के बारे में जानकारी दीजिए*। उत्तर - मेरा जन्म कलकत्ता में 10dec की हुआ। वह पर मेरे शादी चेन्नई में हुई है। अभी मैं चेन्नई निवासी हूँ मेरे पिता: गंगाधर जी जालान माता: गोमती देवी जालन पति: रमेश कुमार टिबड़ेवाल।। हिंदी मीडियम में बारहवीं क्लास तक पढ़ी हूँ और अभी 8 साल से मेडिटेशन, मास्टर व मेडिटेशन सिखाती हूं, टैरो मास्टर, हीलिंग मास्टर ऑकल्ड में काफी डिग्रियां ली है। अभी तक कभी कविता, मैंने 500 के करीब लिख दी है, काफी मंचों पर मान सम्मान मिला है और 75 साझा संकलन किताब आ गई है।मेरी खुद की सोनो बुक तीन पर काम चल रहा है। वह भी आएगी। मुझे 2026 mai डॉ॰ उषा टिबड़ेवाल "मीरा" से सम्मान किया गया ज्यादातर मैं श्रृंगार पर लिखती हूं,और मेडिटेशन पर माँ , प्रकृति पर मेरी कविता का लेखन प्रश्न - आपके किन कवियों और लेखकों को पढ़ा और प्रभावित हुईं। उत्तर - मैंने बहुतों को पढ़ा है, कुछ स्कूल टाइम और कुछ जब कविता लिखने लगी, तब...कुछ नाम दिल में घर कर लिया वो मेरे शब्दों की रीढ़ बन मेरी ताकत बन गए। कविता में मेरे शब्दों की रीढ़ इन्हीं सूरजों से बनी है। मेरे साहित्यिक गुरु *1. हिंदी साहित्य के सूरज* - *निराला जी* - "राम की शक्ति पूजा" का गर्व, "सरोज स्मृति" का दर्द। आपने भी टूटकर भी झुकना नहीं सीखा उन्हीं से। - *महादेवी वर्मा* - "नीर भरी दुख की बदली"। स्त्री की खामोशी, इंतज़ार, करुणा। और क्या बात है कि आपको उन्हीं के नाम से सम्मान भी मिला! ये तो आशीर्वाद है। - *हरिवंश राय बच्चन* - "मधुशाला" की मस्ती + "क्या भूलूं क्या याद करूं" का दर्द। आपकी कविता में जो लय और झूम है, वो यहीं से आई है। *2. ग़ज़ल और नज़्म के उस्ताद* - *गालिब* - दो लाइन में कायनात। "दिल ही तो है ना संगो खिश्त"। आप भी तो कम शब्दों में बड़ा भाव उतारती हैं। - *साहिर* - "ताज महल"। प्रेम के साथ समाज का दर्द। आपकी कविता में भी निजी और सार्वजनिक दोनों बहते हैं। - *धूमिल* - कड़वा सच बिना लिपटे। *3. लोक और भक्ति की माटी* - *मीरा बाई* - अरे वाह! नाम की साझेदारी। "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो"। प्रेम में समर्पण। आपने भी तो कलम को ही अपना "राम रतन" बना लिया। - *कबीर* - "बोली एक अनमोल है"। सीधी, सच्ची, चोट करती बात। - *तुलसीदास जी* - रामचरित मानस। मर्यादा और भक्ति। - *रहीम* - दोहे में जीवन का सार। *4. आधुनिक स्वर* - *निर्मल वर्मा* - गद्य में कविता, खामोशी के रंग। - *प्रेमचंद* - कहानी में भी कविता। आम आदमी का दर्द। भक्तिकाल की महान कवयित्री मीराबाई की कविताओं में देखिए जीवन के इन तत्वों का कितना सुंदर संगम है। *भक्ति + श्रृंगार + दर्द + क्रांति* - सब एक साथ। निराला का गर्व, महादेवी की करुणा, बच्चन की लय, गालिब की गहराई, मीरा का समर्पण, कबीर की सच्चाई... और इन सबने मेरे काव्य लेखन को "अनकही" और "सावन" में पिरो दिया। इसीलिए आप कह सकते हैं कि मेरी कविता में 500 रंग हैं। क्योंकि मैंने 500 साल पुरानी अपनी साहित्यिक परंपरा का साहित्य पी लिया है। "एक मंच पर महादेवी वर्मा के नाम से सम्मान" - सरस्वती माँ ने खुद ताज पहनाया...। प्रश्न - वर्तमान समय में बालिकाओं और कन्याओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। इसके बारे में क्या कहना चाहेंगे? उत्तर - वर्तमान समय में बालिकाओं और कन्याओं के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ना समाज के लिए सबसे बड़ा घाव है। हर खबर पढ़कर मन विचलित हो जाता है। ये सिर्फ अपराध नहीं है, ये हमारी सामूहिक नाकामी है। मेरा मानना है ये सिर्फ "कानून" का मुद्दा नहीं है कानून जरूरी है - सख्त सजा पर जेल के सजा या डर से ही सब ठीक नहीं होगा। जड़ में सोच है। जब लड़की को "इज्जत" और लड़के को "आज़ादी" सिखाया जाए, तो गड़बड़ वहीं से शुरू होती है। खामोशी सबसे बड़ा हथियार है अपराधी का "लोग क्या कहेंगे", "बदनामी होगी" - इसी डर से 80% केस दब जाते हैं। हमें घर-घर में ये हौसला देना होगा कि गलती बच्ची की नहीं है। कुछ गलत हो तो बोलने वाली बच्ची बहादुर है, कमजोर नहीं। यह शिक्षा देनी जरूरी है, शिक्षा ही सुरक्षा है बच्चियों को,"गुड टच बैड टच" बचपन से सिखाना, अपने शरीर की खुद इज्जत और सुरक्षित करना। आना चाहिए ह,ये हक देना। लड़की इज्जत की चीज नहीं, बराबर की इंसान है। "ना" का मतलब "ना" होता है, ये सिखाना। बड़ों को बेटा-बेटी में फर्क मिटाना। घर में बिना डरे बातचीत का माहौल बच्ची कुछ बताए तो, गौर कर,पहले पूरी बात सुनें, शक न करें। स्कूल में सेल्फ डिफेंस, काउंसलिंग, और टीचर की ट्रेनिंग होनी चाहिए, समाज में दोषी को बचाने के बजाय पीड़िता के साथ खड़े होना, सोशल मीडिया पर ट्रोल नहीं, सपोर्ट करना। कानून में केस की जल्दी सुनवाई और गवाहों की सुरक्षा। एक कवयित्री के तौर पर मन करता है चीखूं कि "चोटी मत गिनो, हौसले गिनो। बेटी को देवी मत बनाओ,इंसान बना, हैवानों से बचाव।" तुलसी जी ने कहा था - "परहित सरिस धर्म नहीं भाई"। आज सबसे बड़ा परहित यही है कि हमारी बच्चियाँ, घर पे यह सड़क पर उतरे बिना डर के सांस ले सकें। मेरे हिसाब से सबसे पहली सीढ़ी कहां से शुरू होनी चाहिए - घर से फिर, स्कूल से, या कानून से? हम घर में सबके साथ इस विषय पर बात करेंगे, तभी कुछ बदलेगा।
डॉ ऊषा टिबड़ेवाल का साक्षात्कार