डॉ भगवत स्वरूप शुभम् से राजीव कुमार झा की बातचीत
डॉ भगवत स्वरूप शुभम्
फिरोजाबाद के कवि लेखक चिंतक डॉ (प्रो.)भगवत स्वरूप शुभम् से राजीव कुमार झा की बातचीत...
प्रश्न - आपने साहित्य की समस्त विधाओं में लेखन कार्य किया है। इसके बावजूद व्यंग्य को आपके लेखन का मूल भाव कहा जाता है। इस बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर - यद्यपि मैंने काव्य की सभी विधाओं में लेखन कार्य किया है,तथापि मेरे समस्त गद्य और पद्य साहित्य का मुख्य स्वर व्यंग्य है। हास्य के बिना व्यंग्य लँगड़ा है। कोरा व्यंग्य तीक्ष्ण और कटु हो सकता है,जिसे सहन करना सबके वश में नहीं है। मेरे व्यंग्यों में हास्य कभी उसका साथ नहीं छोड़ता। मेरे काव्य और लेखों में इसका प्राचुर्य है।
प्रश्न - आपकी लिखित पुस्तकों की संख्या काफी है। अपनी उन पुस्तकों के बारे में बताइए जिनमें व्यंग्य शैली की प्रधानता है?
उत्तर - हास्य -व्यंग्यात्मक लेखन मेरे समस्त साहित्य का मूल स्वर है। मेरे सभी सुधी पाठकों और पाठिकाओं ने मेरा सदा उत्साहवर्द्धन किया है। मेरे सभी पाठक ,समीक्षक और अध्येता मेरी प्रेरणा रहे हैं। मेरे व्यंग्य साहित्य पर कानपुर विश्वविद्यालय में शोध कार्य भी हो रहा है ।
हास्य -व्यंग्य शैली में लिखित मेरी कृतियों का विवरण निम्नवत है :----
*काव्य ग्रंथ :*
1.श्री लोकचरित मानस
2.सारी तो सारी गई
3.'शुभम्' कहें जोगीर
4. श्वान पुराण
*गद्य ग्रंथ*
1.'शुभम्' व्यंग्य वातायन
2.विधाता की चिंता
3.'शुभम्' व्यंग्य वाग्मिता
4.'शुभम् ' व्यंग्योत्सव
5. साँची कहे 'शुभम्'
प्रश्न- आपके उपन्यास ग़ज़ल के बारे में खासकर इसके कथानक और विषयवस्तु के बारे में जानकर मुझे अच्छा लगेगा।
उत्तर - 'ग़ज़ल'* मेरा एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है,जिसमें दो प्रेमियों के प्रेम को वाणी प्रदान की गई है।इस कृति के संबंध में साहित्यकार रेखा रोहतगी जी ने लिखा है :
"साहित्य की दोनों प्रमुख विधाओं -गद्य एवं पद्य में समान रूप से कलम के धनी डॉ.भगवत स्वरूप का सद्य प्रकाशित उपन्यास _'ग़ज़ल'_ अत्यंत कमनीय कलेवर में सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।मौलिकता का गुण समाहित किए,सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रचित यह एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है।नायिका प्रधान इस उपन्यास में नायिका _'शुचि'_का चरित्र सम्पूर्ण उपन्यास में छाया हुआ है। उपन्यासकार ने घटनाओं एवं पात्रों के अनुरूप भाषा -शैली का उपयोग किया है। डॉ.स्वरूप का सरस कवित्व इनके पात्रों के संवादों में यत्र-तत्र लघुकाय काव्य -पदों के रूप में मुखर हो उठा है,जिससे कथावस्तु में मधुरता एवं सरसता का संचार हो गया है।"
प्रश्न - आपने हिंदी के महान कवि उपन्यासकार नागार्जुन के साहित्य लेखन पर शोध कार्य किया है। उनके साहित्यिक अवदान के बारे में संक्षेप में बताएं।
उत्तर - बाबा नागार्जुन हिंदी के महान कवि और कथाकार हैं। मैंने उन्हें अपने शोध साहित्य का आधार बनाते समय मात्र उनके उपन्यासकार रूप को ही चुना है । नागर्जुन हिंदी भाषा के ऐसे प्रमुख आंचलिक उपन्यासकार हैं,जो आंचलिक उपन्यास सृजन के क्षेत्र में अग्रणी और अनन्य हैं। उन्होंने अपने जन्म क्षेत्र मिथिला अंचल को आधार बनाकर ही वहाँ की संस्कृति,सभ्यता ,लोक रीतियाँ ,तीज त्योहार,रहन- सहन, खान-पान आदि के जीवंत चित्रण से अपने उपन्यासों में प्राण फूँक दिए हैं। मेरे शोध कार्य करने तक उनके एक दर्जन उपन्यास प्रकाश में आ चुके थे,जो मेरे शोध कार्य की आधारशिला हैं।
प्रश्न - आपने महात्मा बुद्ध के जीवन चरित को आधार बनाकर भी महाकव्य लेखन किया है। इसके बारे में जानकारी दीजिए।
भगवान बुद्ध के महान त्याग और तपस्या से प्रभावित होकर इस महाकाव्य का सृजन बचपन में हाई स्कूल करने के बाद 17-18 वर्ष की आयु में ही हो गया था। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि मेरे लेखन का श्रीगणेश ही इस महाकाव्य के लेखन से हुआ। बचपन से ही मैं एक अध्ययनशील विद्यार्थी रहा। यों तो मेरे लेखन का श्रीगणेश मात्र
ग्यारह वर्ष की आयु से ही उस समय हो गया था,जब मैं कक्षा चार का छात्र था।
इस महाकाव्य में तपस्वी बुद्ध का समग्र जीवन वृत्त ही मुझे प्रभावित कर गया। एक युवक जो राजसी परिवार में जन्मता है और समस्त राज सुखों को त्यागकर सन्यासी बन कर मानव मात्र की सेवा के लिए गृहाभिनिष्कर्मण कर देता है,उसका जीवन निस्संदेह अनुकरणीय और प्रेरक तो है ही।
यद्यपि यह अकिंचन भगवत ऐसा कुछ भी नहीं कर सका ,किन्तु जो संस्कारों का बीज वपन मेरी मानस भूमि में हुआ ,वही मेरे आगामी साहित्य सृजन का पाथेय बना। *'तपस्वी बुद्ध'* महाकाव्य से एक अंश देखिए :
'क्रिया का कारण है सिद्धार्थ
देर मत कर चल उस अर्थ।
अभी तो चले जा रहे राह
करेंगे तप से पूरी चाह।।'
× × ×
'जौ प्रिय होते यहाँ घर पै,
नव नेह की डार पै डारती झूला।
मारते पींग पिया पटुली,
नत बैठी हूती डर से मन फूला।।
कौन बिना प्रिय के जग में,
मन मीत भयौ मति के अनुकूला।
रे बदरा वन को न गए,
केहि बात पै प्राण भयौ प्रतिकूला।।'
इस महाकाव्य में दस सर्ग और 258 पृष्ठ हैं।
प्रश्न - आप फिरोजाबाद के निवासी हैं। यहां आपके कार्य व्यवसाय के बारे में जानकार मुझे खुशी होगी।
मैं मूलतः फिरोजाबाद का नहीं आगरा महानगर के पास स्थित एक छोटे से गाँव पुरा लोधी का निवासी हूँ,जहाँ मैंने अपना बचपन, कैशोर्य और युवावस्था का जीवन जिया। मैं हाई स्कूल से स्नातक कक्षाओं तक विज्ञान का विद्यार्थी रहा। इधर मेरी अभिरुचि काव्य आदि लेखन के प्रति बाल्यावस्था से ही रहने के कारण एम.ए.हिंदी से कर लिया और बिना पतवार के नाव खेते हुए अपना पीएचडी का शोध कार्य भी 1978 में पूरा कर लिया। मेरे पूज्य पिताजी एक सामान्य मध्यमवर्गीय कृषक थे और पूजनीया माँ
गृहिणी थीं,जो कभी किसी विद्यालय में पढ़ने नहीं गईं। पूज्य बाबा जी (पितामह) एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जो गांधी जी आदि के साथ 1932 और 1942 में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय रहने के कारण जेल गए। चाचाजी आगरा कालेज आगरा में प्रोफेसर रहे और 1995 में सेवानिवृत्त होकर इस समय गाँव में ही रहते हैं। मैं 1980 में राजकीय सेवा में आया और हिंदी व्याख्याता के पद पर प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी बना।
लेखन कार्य अनवरत चलता रहा और 1992 में मेरी पहली कृति *श्री लोकचरित मानस* (हास्य व्यंग्य काव्य) बीसलपुर (पीलीभीत)से ही प्रकाशित हुई।
बीसलपुर मेरी प्रथम कर्मभूमि थी। सात - आठ राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन का अनुभव करने के बाद 2013 में राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय सिरसागंज (फिरोजाबाद) से सेवानिवृत्त हुआ तो अपना स्थाई आवास यहीं बना लिया। गाँव में मेरे तीन छोटे भाई और बड़ा बेटा रहते हैं। मेरी चार छोटी बहनें हैं ,जो शादी के बाद अपनी अपनी ससुरालों में निवास करती हैं।मेरी एक बेटी आगरा में आयुर्वेदिक डॉक्टर है और बेटा दिल्ली में एक कम्पनी में प्रबंधक है। मैं सपत्नीक सिरसागंज स्थित आवास में रहता हुआ माँ सरस्वती की साधना करता हूँ।
प्रश्न - साहित्य की तरफ आपका झुकाव कैसे क़ायम हुआ? अपने बचपन माता- पिता और शिक्षा दीक्षा के बारे में बताइए।
उत्तर - मुझे बाल्यावस्था से ही पढ़ने -लिखने का सद्व्यसन रहा।
यद्यपि पूज्य पिताजी मात्र कक्षा चार तक ही पढ़े-लिखे थे, किन्तु मेरे चाचाजी डबल एम.ए.और मनोविज्ञान से पीएचडी हैं। वह भी प्रोफेसर रहे हैं। वे रोज आगरा कालेज गाँव से ही शिक्षण कार्य करने साइकिल से आते जाते थे। उनकी दो अलमारियों में तालाबंद किताबों को बाबा जी की कुर्ते की जेब से चाबी चुराकर मैं किताबें पढ़ता रहता और पढ़ने के बाद किताब वहीं लगा देता और दूसरी किताब निकाल कर पढ़ने लगता। एक किताब पढ़ने में दो- तीन दिन लग जाते। उस समय मैंने प्रसाद, पंत, निराला, प्रेमचंद, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' , कबीर, सूर ,तुलसी क्या कुछ नहीं पढ़ा ? पूरा एम .ए. हिंदी का कोर्स जूनियर हाई स्कूल करने से पहले पढ़ चुका था। बुद्ध साहित्य पढ़ने का चसका बहुत पहले से था ही। बस क्या था, माँ सरस्वती की कृपा हो चुकी थी, मेरी लेखनी इसी प्रकार गतिशील बनी रही और आज तक उनकी कृपा से 51 कृतियों का सृजन हो चुका है। जो कुछ बचपन में पढ़ा,उस सबका सद्प्रभाव मेरे साहित्य सृजन पर पड़ना स्वाभाविकता था, और वह पड़ा भी।
प्रश्न - आप फिरोजाबाद के निवासी हैं। इस शहर के इतिहास, संस्कृति और यहां के जनजीवन के बारे में बताइए।
उत्तर - मैं मूलतः आगरा का निवासी हूँ। क्योंकि मेरे जन्मकाल से पढ़ने -लिखने और राजकीय सेवा में आने के प्रथम 28 वर्ष आगरा के ग्राम्य परिवेश में ही बिताए हैं । आगरा कला स्मृति ताजमहल ,लाल किले,रामबाग,एत्माउदौला, सिकंदरा, फतेहपुर सीकरी ,चीनी का रोजा आदि विभिन्न पुरातात्विक इमारतों के साथ-साथ पेठे की मिठाई, खेल के सामान और जूतों के निर्माण के लिए जाना जाता है। इसमें सूर्यसुता यमुना नदी बहती है।
पहले फिरोजाबाद भी आगरा जिलान्तर्गत एक शहर हुआ करता था ,जो 05 फरवरी 1989 को एक स्वतंत्र जनपद बनाया गया। यह प्रमुखतः सुहाग नगरी अर्थात् चूड़ियों का शहर के नाम से विश्व विख्यात है। यहाँ से न केवल चूड़ियाँ बल्कि अन्य काँच का सामान , प्रकाश उपकरण, विज्ञान सम्बंधी उपकरण सारे विश्व में निर्यात किए जाते हैं। यहाँ कई उच्च शिक्षा के महाविद्यालय भी हैं, जिनमें से सी .एल. जैन पी. जी.कालेज में मैं प्राचार्य रहा हूँ। मेरे पास 2012-13 में अपने राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय सिरसागंज का और सी.एल.जैन महाविद्यालय का एक साथ प्रभार रहा। सिरसागंज फिरोजाबाद की तहसील है, जो वहाँ से लगभग 35 किलोमीटर दूर नेशनल हाई वे 2 पर स्थित है। हमारा महाविद्यालय जनपद का एकमात्र राजकीय कालेज है।
विशेष:लेखक के शिष्य और परिजनों द्वारा उनका 75 वाँ जन्म उत्सव अमृत महोत्सव के रूप में आयोजित किया जा रहा है। इसके लिए एक वृहत अभिनंदन ग्रंथ का लोकार्पण भी होगा, इसमें लेखक की अन्य सामग्रियों के साथ उनकी 51 कृतियों की 61 समीक्षाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं । यह समारोह दिसम्बर 2026 में होगा।
धन्यवाद, आपका आभार।

