साहित्य सृजन संवाद

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अयंतिका दास से राजीव कुमार झा की बातचीत

अयंतिका दास

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बनारस की कवयित्री अयंतिका दास से राजीव कुमार झा की बातचीत... प्रश्न - कला की अन्य विधाओं की अपेक्षा कविता में आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति कितनी सहजता से होती है? उत्तर: मेरे विचार से कविता आत्मा की सबसे स्वाभाविक भाषा है। चित्रकला, संगीत, नृत्य और रंगमंच भी भावों की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम हैं, किंतु कविता शब्दों के माध्यम से मन के सूक्ष्मतम स्पंदनों को सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचा देती है। जो अनुभूतियाँ सामान्य संवाद में व्यक्त नहीं हो पातीं, वे कविता में सहज रूप से आकार ले लेती हैं। इसलिए मेरे लिए कविता केवल साहित्य नहीं, बल्कि आत्मा का साक्षात्कार है। प्रश्न - आपकी कविताओं में जो पीड़ा, व्यथा, विरह और वेदना के भाव प्रकट होते हैं, उनमें प्रेम की भूमिका को आप कितना सहज और सरस महसूस करती रही हैं? उत्तर: मेरे लिए प्रेम केवल मिलन का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मबोध की यात्रा भी है। विरह, पीड़ा और वेदना प्रेम के अभिन्न आयाम हैं। इन्हीं अनुभवों से संवेदना गहराती है और कविता जन्म लेती है। मैं मानती हूँ कि सच्चा प्रेम मनुष्य को अधिक मानवीय और अधिक संवेदनशील बनाता है। इसलिए मेरी कविताओं में प्रेम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और मानवीय संबंधों के प्रति गहरे लगाव का प्रतीक है। प्रश्न - बनारस में आप कब से रह रही हैं और यहाँ के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की विशिष्ट बातों का उल्लेख किस तरह से करना चाहेंगी? उत्तर: मैं बनारस में अपने उच्च शिक्षा के लिए सितम्बर 2024 से रह रही हूँ। यह नगर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और ज्ञान की जीवंत परंपरा है। यहाँ की गंगा आरती, घाटों का सौंदर्य, मंदिरों की आध्यात्मिक ऊर्जा, लोकजीवन की सहजता और विविध संस्कृतियों का समन्वय हर संवेदनशील व्यक्ति को प्रभावित करता है। बनारस ने मेरी दृष्टि को व्यापक बनाया है और मेरी रचनात्मकता को नई दिशा प्रदान की है। प्रश्न- सदियों से अध्यात्म के सात्विक भावों से अपनी पहचान कायम करने वाली हिंदी कविता में अब विद्रोह के स्वर क्यों कायम हो रहे हैं? उत्तर: मेरा मानना है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। प्रत्येक युग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं और कविता उन चुनौतियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। आज जब समाज असमानता, अन्याय, हिंसा और मानवीय मूल्यों के संकट से जूझ रहा है, तब कविता में विद्रोह का स्वर स्वाभाविक है। यह विद्रोह नकारात्मकता का नहीं, बल्कि परिवर्तन, न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना का विद्रोह है। अध्यात्म और प्रतिरोध परस्पर विरोधी नहीं हैं; सच्चा अध्यात्म अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा भी देता है। प्रश्न - बनारस कबीर और तुलसी की काव्य-साधना भूमि है। इन युगद्रष्टा कवियों की कविता की परंपरा साहित्य में सृजन के किन स्वरों के संधान का आह्वान निरंतर करती है? उत्तर :कबीर और तुलसी दोनों ने अपने-अपने ढंग से भारतीय समाज को नई दृष्टि दी। कबीर ने सत्य, निर्भीकता, सामाजिक समरसता और आडंबर-विरोध का संदेश दिया, जबकि तुलसी ने लोकमंगल, मर्यादा, भक्ति और मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। उनकी परंपरा आज भी साहित्यकारों को सत्यनिष्ठ, जनोन्मुख और मूल्यपरक सृजन का आह्वान करती है। मेरा विश्वास है कि एक रचनाकार का दायित्व केवल सुंदर शब्द लिखना नहीं, बल्कि समाज में संवेदना, विवेक और मानवीय चेतना का संचार करना भी है। इसी अर्थ में कबीर और तुलसी आज भी हमारी रचनात्मक यात्रा के पथप्रदर्शक हैं।
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