साहित्य सृजन संवाद

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पुस्तक समीक्षा

किसानों की कर्मशीलता और उनकी महिमा का वर्णन:अवध किशोर झा के कविता संग्रह किसान भारत की राजेश कुमार सोनार के द्वारा लिखित समीक्षा

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

‎ ‎          प्राकृतिक सौंदर्य के बीच भौतिक सुख सुविधाओं की अनुपलब्धता के बिना भी कष्टों में रहकर मुदित जीवन बिताने वाले जीवन को ही भगवान का जीवंत रूप धरे किसान माना जाता है। उसकी कर्मशीलता और तपस्या सिर्फ अपने लिए नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव और अन्य जीवों के लिए आवश्यक है क्योंकि वह  सिर्फ अनाज ही उत्पन्न नहीं करता वरन् सृष्टि की सबसे बड़ी आवश्यकता की पूर्ति भी करता है। ‎               श्री अवध किशोर झा जी की जिन्दगी ग्रामीण परिवेश में गुजरने और कवि पुत्र होने की वजह से प्रकृति से साम्य बनाए रखकर उसको शाब्दिक चित्र में अंकित किया गया है। ‎               किसान पर ऋतुओं के परिवर्तन या मौसम की कठिनाई को आत्मसात कर अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहने की जीजीविषा प्रथम कर्म होता है जिसके लिए वह कष्टों की परवाह नहीं करते हुए उसमें भी खुशी के घोंसले बनाकर खुश होना जानता है।  ‎                    उसे न ही आंधी तूफान रोक पाती और न ही तेज बरसात। उसे अपने गाय बैल, खेत खलिहान और पौधे तथा फसल की चिन्ता से बढ़कर कुछ भी नहीं होता। उसे मिट्टी की बहुत प्यार रहता है क्योंकि वह माटी का पुत्र ही नहीं होता अपितु उसका रक्षक सिपाही भी होता है। किसान अगर ये कर्म नहीं करेगा तो धरा हरियाली विहीन होकर प्राणवायु रहित हो सकती है। इसीलिए किसान को धरती का भगवान माना जाता है। ‎                      श्री अवध किशोर झा जी ने अपनी लेखनी से ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, कृषकों का समर्पित जीवन को अपनी रचनाओं में स्थान देकर उन्हें गरिमामय स्वरूप प्रदान किया है। उनकी लेखनी को नमन करता हूं। ‎ आपने एक आदर्श पुत्र बनकर उनकी अप्रकाशित रचनाओं को काव्य संग्रह के रूप में जनमानस तक पहुंचाने का प्रयास किया है इसके लिए आपका अभिनन्दन करता हूं। ‎ ‎ राजेश कुमार सोनार ‎ सांईभूमि कालोनी बिलासपुर ‎ (छत्तीसगढ़) 495001