साहित्य सृजन संवाद

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परिचर्चा

पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिला में स्थित इस्लामपुर की कवयित्री डॉ निधि बोथरा जैन

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

मेरे कविता संग्रहों 'जज्बातों के धागे', 'भावों के उद्गार' और 'कलम की कायनात' तीनों संग्रह को मैंने अपनी अनुजा डॉ दीपिका बोथरा जैन को समर्पित की है। मेरी लेखनी की हर यात्रा में मेरे अंतर्मन और बाह्य जगत के अंतर्संबंधों के साथ साथ उसकी प्रेरणा से उपजी है। मुझे मूर्त प्रसंगों के रूप में प्रकृति के बदलते रंग, मानवीय चेहरे से प्रेरित करती है। वहीं अमूर्त रूप में प्रेम, विरह, करुणा, और मन के भीतर उठने वाले मौन द्वंद्व मेरी कविताओं की आत्मा हैं। जब हृदय का भावों से मिलन होता है, तो वह कोरे कागज़ पर स्याही से अक्षर, अक्षर से शब्द और शब्द से कविता बनकर उतर जाती है। इस प्रकार, दृश्य और अदृश्य दोनों ही परिवेश निरंतर मेरी लेखनी को जीवंत बनाए रखने की ऊर्जा देते रहे हैं। *मेरा काव्य कर्म मेरे अपने जीवन, जैनत्व का धर्म, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से पूरी तरह प्रभावित है। संवेदनशीलता, समाज में व्याप्त विषमताएं, लोक-परंपराएं और अपनों से एवं इस आभासी जगत से मिला स्नेह और कुछ ऐसे लोग जिन्होंने मुझे शून्य समझा था उनकी भावनाओं को मेरे प्रति सकारात्मकता मे परिवर्तन करने का प्रयास मेरी कविताओं की पृष्ठभूमि में जीवंत रहते हैं। कोई भी कलमकार कभी भी समाज से पृथक होकर नहीं लिख सकता; वह जो कुछ अपने आसपास देखता और महसूस करता है, वही उसकी रचनाओं में ढलता है। मेरी लेखनी भी उसी परिवेश का एक दर्पण है, जिसमें मैंने सांस ली है और जिसे करीब से जिया है।* इस्लामपुर पश्चिम बंगाल उत्तर दिनाजपुर जिले में स्थित एक खूबसूरत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध श्रेत्र है। मेरा बचपन एवं शिक्षा सब यही से हुई है। यहाॅं के शांत परिवेश में मुझे संगीत सुनना और गुनगुनानें का एवं पुस्तकें पढ़ने का भी शौक है, जो मुझे मानसिक सुकून देने के साथ नए विचारों से जोड़ते हैं। यहाँ का सामाजिक जीवन मुझे हमेशा कुछ नया लिखने और रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहने की प्रेरणा देता है। साहित्य की दुनिया में जिनकी महती कृपा से मुझ में कुछ लिखने का साहस प्राप्त हुआ वो तेरापंथ धर्मसंघ से एकादश आचार्य श्री महाश्रमणजी जी, उनके आगमन पर स्वागत में चार पंक्तियां रखने का गुरु मुखावृंद जो आशीष प्राप्त हुआ था वहीं से यह सफर शुरू हुआ था। फिर माॅं वीणा वादिनी की उंगली थामकर मैंने शब्दों की दुनिया में चलना और उन्हें महसूस करना सीखा वहीं ममता करुणा वात्सल्य की प्रतिमूर्ति शासन माता अष्टम साध्वी प्रमुखा श्री की असीम अनुकम्पा और ममत्व का ऑंचल प्राप्त हुआ और सफर गतिमान है।
पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिला में स्थित इस्लामपुर की कवयित्री डॉ निधि बोथरा जैन