कविता लेखन: पटना की कवयित्री रचना मिश्रा 'रूही'

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा
पटना हमेशा से साहित्यकारों के लिए उनका प्रिय स्थान रहा है। यहां विभिन्न प्रकार की साहित्यिक गतिविधियां होती रहती हैं।
यहां बिहार साहित्य सम्मेलन का रजिस्ट्रेशन भी होता है और उससे जुड़े लोग सदैव साहित्यक कार्यक्रम में भाग लेते रहते हैं । इसके अतिरिक्त कई संस्थाएं हैं जो सदैव काव्य गोष्ठी का आयोजन करती हैं।
यहां विभिन्न प्रकार के प्रकाशक हैं जो आपकी रचना को पुस्तक का रूप देते हैं। फिर पटना के गांधी मैदान में दिसंबर में प्रत्येक वर्ष पुस्तक मेला का भव्य आयोजन होता है। जिसमें साहित्य से संबंधित कार्यक्रम होते हैं यथा काव्य पाठ, नुक्कड़ नाटक आदि... ।
बातें तो बहुत सी हैं ।अच्छी भी बुरी भी... जब मैं पहली बार रेडियो स्टेशन गई थी तो वहां जब रिकार्डिंग रूम देखी तो बहुत अच्छा लगा था । रूम बिल्कुल शीशे से बंद था और रिकॉर्ड कैसी हो रही है वो शीशे के बाहर हाथ से इशारा कर बताते थे। तो ये मेरे लिए यादगार पल था।
इस शहर की यादगार बातें तो आप जानते ही होंगे । सम्राट अशोक ! उनके मौर्य काल की
पुरातत्व संपदाएं आदि। फिर पटना का गोलघर जो अंग्रेजों ने बनाया था अन्न भंडार के लिए।
आज के समय गंगा आरती, मरीन ड्राइव, जैविक उद्यान सहित ढेर सारे घूमने के स्थान हैं।
बिल्कुल मैंने प्रेमचंद को पढ़ा, रविन्द्रनाथ टैगोर, शरद चंद्र, तसलीमा नसरीन की चार कन्या, फिर राजकमल चौधरी फणीश्वरनाथ रेणु इत्यादि...
बिहार ग्राम्य संस्कृति प्रधान है । इसे ऐसे समझ सकते हैं कि मैं पटना में हूँ । यह बिहार की राजधानी है। और यहाँ भी कोई भी त्योहार होता है तो महिलाएं पीला सिंदूर नाक से लगाती हैं... फिर गाहे बगाहे आपको गांव की ठेठ भाषा मिलेगी। फिर सारे त्योहार एक दूसरे के साथ मिलकर मनाते हैं... !
इन दिनों महिलाओं पर अत्याचार की खबरें रोजाना पढ़ने को मिलती हैं। इसमें सबसे पहले तो मुझे नहीं लगता कि महिलाओं पर कहीं अत्याचार हो रहा है... सभी वस्तुओं के भीतर ढेर सारी बातें होती हैं.. बातें जो हमलोगों के समक्ष आती हैं तो उन्हें किस प्रकार से परोसा गया है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण बातें हैं।
और कुछ कुछ जो घटनाएं सामने आतीं हैं तो हमें ये समझना चाहिए कि लड़की तो लड़की होती है और लड़का तो लड़का होता है। हम बराबरी करते - करते वहाँ पहुँच गये हैं जहाँ लड़के गये ही नहीं.. ये काफी विवादास्पद प्रश्न है
पहले तो बस थोड़ी सा कविता लिख लिया करती थी। अपनी भावना को सफेद कागज के पन्नों पर। पर आज के समय में जीवन में बहुत सारे गुरु मिले जिनसे...छंद की भी कुछ जानकारी मिली तृप्ति जैसे दोहा, रोला, मनहरण इत्यादि
फिर कहानी भी लिखती हूँ फिर गजल बहर में लिखती हूँ फिर वर्ण पिरामिड, सेदोका, माहिया इत्यादि फिर दोहा गीत भी मैंने कई लिखा है।

