कविता लेखन: हम मां शारदे के अर्चक हैं। हममें ईमानदारी हो

ममता तिवारी मृदुला
कविता पाठकों के हृदय तक पहुँचे, उन्हें लगे कि हमने आज कुछ सच में पढ़ा है। हमारी रचना समाज को कुछ संदेश दे, साथ ही काव्य को जीने वालों को लगे कि हम इस रचना की समीक्षा करने के लिए अपने ज्ञान को कम पा रहे हैं।
उसके लिए हम अनछुए विषय और मौलिक विचार लें। जो सैकड़ों बार लिखी-कही जा चुकी है, वही बात लिखकर भी क्या होगा? शीर्षक ही देखकर पाठक पढ़ना छोड़ देते हैं।
सबसे मुख्य बात - हम माँ शारदे के अर्चक हैं, हममें ईमानदारी हो। हम किसी के काव्य-भाव और कविता न चुराएँ। सचमुच अच्छे लेखक-कवि बनें।
इसके लिए हम सभी प्रयास करते हैं।
लेकिन कविता में कभी हमारा भाव छूट जाता है, कहीं कथ्य छूट जाता है। कथ्य को पकड़ते हैं तो छंद-मापनी चूक जाती है। कभी वर्तनी, कहीं व्याकरण, कहीं अलंकरण, कभी लय, प्रवाह,कभी माधुर्य, किसी में कलन। कभी कविता क्लिष्ट हो जाती है, भाव को अर्थाना पड़ता है। कभी अति सहज - जो कविता न लगकर गद्य में आम बोलचाल की भाषा लगती है।
आम तौर पर कवि जो लिख रहा है, उसको पढ़ते-सुनाते समय यदि उस कविता के लिए भूमिका बाँधनी पड़े, पूर्व में कुछ बताना पड़े, तो वह भी कविता का दोष कहलाता है। रचना में रचना का उद्देश्य, कारण, कारक निहित हो - ऐसा श्रेष्ठ काव्यकारों ने माना है।
और जो इन सबको उत्तम प्रकार से उपयोग कर रचना सृजित कर भी ले, तो प्रेषित करते समय कुछ टाइपिंग मिस्टेक रह जाता है।
इस प्रकार कितनी कसौटियों से गुजरकर, कितने मानकों को पार कर एक रचना सृजित होती है। कुछ भी लिखना और काव्य-रचना दो अलग बातें हैं। किसी कवि ने कहा है - _कम लिखें, पर कीमती लिखें_।
तब काव्य और कवियों का सम्मान होगा।
काव्य लिखना नहीं सीखे हैं, मात्रा-मानकों का ज्ञान नहीं हुआ है, तब ज्ञान लेते तक साहित्य की बहुत सारी गद्य-विधाएँ हैं, जिनमें लिखकर बहुत से लेखक अमर हो गए। लेख, आलेख, लघुलेख आदि लिखें।
लेकिन आधुनिक कविता के नाम पर काव्य की गरिमा और सरलता न बिगाड़ें।
