साहित्य सृजन संवाद

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हिमाचल प्रदेश की लेखिका सुषमा खजूरिया: जीवन और साहित्य लेखन

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

मेरा मानना है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। जीवन में केवल सुख ही नहीं, दुःख, संघर्ष और पीड़ा भी है। अगर हम उन आवाज़ों को अनसुना कर देंगे जो दब गई हैं, तो साहित्य अधूरा रह जाएगा। मैंने कोशिश की है कि आम आदमी, किसान, मज़दूर और नारी, बच्चों की चुप्पी को शब्द दूं। साहित्य का काम सिर्फ मनोरंजन नहीं, संवेदना जगाना भी है। मैं हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की निवासी हूं। मेरा अंचल बिलासपुर रियासत का क्षेत्र कहलाता है, जो आज गोविंदसागर झील के किनारे बसा है। बिलासपुर की सबसे बड़ी पहचान भाखड़ा बांध है। इस बांध को बनाने के लिए हमारे अंचल के हजारों परिवारों ने अपनी जमीन, घर और गांव का बलिदान दिया। आज हम जिस समृद्धि और बिजली को देखते हैं, उसकी नींव में हमारे पूर्वजों का त्याग है। कला-संस्कृति: यहां पहाड़ी नाटी, लोकगीत,पहाड़ी गिद्धा प्रसिद्ध है | नयनादेवी, बच्छरेटू रुक्मणि कुण्ड और मार्कण्डेय जैसे तीर्थ स्थान हमारी आस्था के केंद्र हैं। जनजीवन: बिलासपुर के लोग मेहनती, स्वाभिमानी और प्रकृति प्रेमी हैं। त्याग, बलिदान और भाईचारा - यही हमारे अंचल की असली विशेषता है। मेरे हृदय में मुख्य रूप से तीन भाव रहते हैं - करुणा, आशा और प्रश्न। करुणा, असहाय और प्रकृति के प्रति आशा अंधकार के बाद उजाले की, समाज में फैली असमानता और अन्याय पर। मैं चाहती हूं मेरी कविता पढ़कर पाठक न केवल द्रवित हो, बल्कि सोचने पर भी मजबूर हो। इसे मैं साहित्य के लोकतंत्रीकरण के रूप में देखती हूं। पहले कविता दरबारों और किताबों तक सीमित थी, आज फेसबुक ने हर व्यक्ति को मंच दिया है। जब कोई त्रासदी होती है तो लोगों का दर्द तुरंत कविता बनकर सामने आता है। हां, कुछ रचनाएं सतही भी होती हैं, पर मूल भावना सच्ची होती है। मुझे लगता है ये समय की मांग है। साहित्य की सहजता और शाश्वतता की बात बिल्कुल सही है। सहज का अर्थ है बनावट से दूर, दिल से निकली बात। और शाश्वत का अर्थ है - प्रेम, विरह, करुणा, मृत्यु,राष्ट्र प्रेम, प्रकृति ये भाव हर युग में एक जैसे रहते हैं। मेरी कोशिश यही रहती है कि मेरी भाषा सरल हो, पर भाव गहरे हों। तभी वर्षों बाद भी कोई कविता दिल को छू सकेगी। मेरा बचपन जालंधर पंजाब में व्यतीत हुआ l बचपन से ही तुकबंदी करके कविता बनाती और स्कूल के मंच पर सुनाती थी | शिक्षा ने मुझे ज्ञान दिया और जीवन ने अनुभव। धीरे-धीरे पढ़ते-पढ़ते साहित्य से लगाव हुआ। लगा कि जो महसूस करती हूं, उसे शब्द देना ही मेरा धर्म है। मेरे 'चीत्कार 'उपन्यास में पंजाब के दंगों पर आधारित घटनाओं का वर्णन है, जिससे जन साधारण प्रभावित होता है l 'चप्पा धूप 'उपन्यास में चम्बा भरमौर की प्राकृतिक सुषमा और मणिमहेश वर्णन एवं नशे के शिकार युवकों की दयनीय दशा का मार्मिक चित्रण है | मेरे ' किरण कोहरा' कविता संग्रह में विभिन्न विषयों की कविताएं हैं, बाल साहित्य पर काम किया है। मेरी कोशिश रही कि बच्चों के साहित्य में संस्कार और इतिहास दोनों आएं। जैसे "हकीकत राय" और "भाखड़ा के बलिदानी" पर बाल कविता।" मेरे 'जड़ों की ओर ' कहानी संग्रह की कहानियां अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देतीं हैं | इसी तरह 'मानवता कराह उठी 'लेख संग्रह में विभिन्न विषयों पर लेख हैं | प्रेरणा: मुझे महादेवी वर्मा की करुणा, सुभद्रा कुमारी चौहान का ओज, और डॉ इंदु बाली की मानवीय संवेदनाओं की गहराई l हिमाचल के लोक कवियों की सहजता ने हमेशा प्रेरित किया है। कविता के अतिरिक्त मुझे कहानी, उपन्यास मुझे बच्चों को लोक संस्कृति से अवगत करवाना और संस्कृति को सहेजना, पारंपरिक व्यंजन बनाना भी मेरी रुचि है। साहित्य मेरे लिए सिर्फ लिखना नहीं, जीना है।