साहित्य सृजन संवाद

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परिचर्चा

डॉ दुर्गा सिन्हा " उदार"

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

मेरे पिता श्री रामनंदन प्रसाद रिटायर्ड कलेक्टर ( आज हमारे साथ नहीं हैं) मेरे मित्र, सखा, साथी, बंधु मेरे मार्गदर्शक जिनकी प्रेरणा से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। वे मेरे सबसे अच्छे मित्र व सलाहकार थे। मेरी हर बात धैर्य से सुनते और सही दिशा निर्देशित करते। सतत प्रोत्साहन प्रशंसा व प्यार का ही परिणाम है मेरा व्यक्तित्व। समय का महत्व, समाज सेवा का भी और पुस्तकों से मित्रता, मैंने पिता से सीखा। उनके वाक्य हर घड़ी आज भी मुझे सचेत करते हैं,संकेत करते हैं और सही राह दिखाते हैं। उसूलों पर चलना, निष्पक्ष रहना, सही निर्णय लिया है तो डरना किसी से भी नहीं। यह सब उनकी ही देन है। तर्कसंगत बात रखती हूँ तो डरती नहीं, पीछे भी नहीं हटती। लोगों को पीछे हटना पड़ता है। मतलब मेरी बात सही लगती है और लोग बात मानते हैं यदि प्रारम्भ में विरोध होता भी है तो क्योंकि भेद-भाव रहित सही निर्णय लेने की क्षमता भरी है पिता ने बचपन से।भावनात्मक कमजोरी से काम नहीं लेती हूँ। जो उचित है वही उचित है। एक बात और महत्वपूर्ण जो उनसे सीखी कि “दान करो या मदद करो किसी की तो वापस कुछ पाने की उम्मींद रख कर न करना “ वापस आए तो बहुत बढ़िया, न आए तो मन दुःख न हो। यह बहुत बड़ा शांति मंत्र है। दूसरा यह कि “अगर कुछ खो जाए, गिर जाए, चोरी हो जाए तो मन को समझाना कि ईश्वर किसी की मदद करने के लिए तुम्हारे पास से उस तक पहुंचा रहा है। “ दुःखी मत होना। आगे बढ़ना, पीछे मत देखना। बहुत सी बातें हैं। घर पुस्तकों का भण्डार थी पिता जी को पढ़ने का बेहद शौक था। बंगला, उर्दू, हिन्दी,संस्कृत,भोजपुरी अंग्रेज़ी भाषा के जानकार।दो अख़बार और अनेक पत्रिकाएँ आती थीं लाइब्रेरी से भी ढेर सारी पुस्तकें आतीं । गर्मी की छुट्टियों में ख़ास। तब मनोरंजन के साधन भी तो ये ही थे। नौकरी के दौरान तीन बार बनारस तबादला हुआ।फिर बनारस में ही बस गए। काशी विश्वनाथ ने अपनी गोद में अपने भक्त को रख लिया।शिव बाबा से झगड़ पड़े थे एक बार तो फूल-माला, प्रसाद लेकर महंत जी आए घर पर मनाने, तब पिताजी दर्शन करने गए थे। उसके बाद से हर साल अन्नकूट का प्रसाद हमारे यहाँ आता रहा।पिताजी के देहान्त के चार साल बाद माता जी का देहान्त हुआ तब तक आता रहा। इतनी कृपा रही। उनके तो बहुत से किस्से हैं यह भी अधिक ही हो गया। मेरी माता जी श्रीमती अवध नंदिनी कुशाग्र बुद्धि की गृहिणी। जीवन जीने की कला, व्यावहारिकता, इंसानों को पहचानने व परखने की कला उनको देख-देख कर थोड़ा मैं भी सीख गई। उनके समान दक्षता तो हासिल नहीं कर सकी लेकिन हाँ कब कहाँ कैसे किस तरह व्यवहार करना है,यह सीखा है। परिवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पण, खुद को कष्ट दे कर भी परिवार को बाँधे रखने में माहिर थीं मेरी माँ। थोड़ा-थोड़ा मैंने भी निभाया। अब मेरी बेटी निभा रही है। सिलाई-कढ़ाई, बुनाई, यूँ कहूँ कि सौंदर्य बोध मेरी माता जी की ही देन है। शिक्षा भी ईश्वर कृपा से बहुत बेहतर हुई। दसवीं पास कर सात साल हॉस्टल में रही।पूर्ण व्यक्तित्व विकास का अवसर वहाँ मिला। प्रारम्भिक संस्कारों ने दृढ़ता रखी और विविध योग्यताओं का चहुँमुखी विकास हॉस्टल जा कर हुआ। वहीं शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम् में दक्षता हासिल की, पेंटिंग, खेल, वालीबॉल कैप्टेन बनी । यूनिवर्सिटी स्तर पर नृत्य व खेल में अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। बहुत सकारात्मक पर्यावरण मिला हर जगह। B.H.U. से M.A., Ph.D. मनोविज्ञान की डिग्री ले कर कॉलेज में नौकरी की। प्राचार्या ने बुला कर नौकरी दी। ये सब आज उपलब्धियाँ ही लगती हैं। व्यक्तित्व के निखरने की खुली दिशा मिले, यही मार्गदर्शन मिले तो इंसान बहुत कुछ कर सकता है। ससुराल - भागलपुर, बिहार मेरे ससुर जी श्री जयन्ती प्रसाद कमिश्नरी में प्रशासनिक अधिकारी थे।अंग्रेज़ी बहुत अच्छी थी। लिखावट भी बहुत बारीक और साफ़ बहुत लम्बे पत्र लिखा करते थे बेटे (मेरे पति) को मेरी सासू माँ श्रीमती ललिता देवी साक्षात देवी । बेहद कर्मठ यह भाव कभी नहीं रहा कि सब बहू करे।मुझसे पहले खुद कर लेना चाहती थीं। हमेशा ख़ुश रहती थीं। हालाँकि छठ के अर्घ्य देने में दुर्घटनाग्रस्त होने से पैर टूटा था और तब हड्डी गलत जोड़ दी थी डॉक्टरों ने। कभी चेहरे पर पीड़ा और उदासी नहीं दिखी। बहुत प्रेरणास्पद व्यक्तित्व था। कभी थकान नहीं लगती थी जब कहो हाज़िर। मायके व ससुराल दोनों जगह किसी के मुँह से यह शब्द नहीं सुना कभी कि “बाद में करेंगे।”कुछ कहा तो तुरंत तैयार करने के लिए। यह शायद उस ज़माने की ख़ूबी थी। मेरी तीन ननदें,एक जेठ सभी पढ़े-लिखे। इंजीनियर ( मेरे पति व ननदोई )डॉक्टर, (ननद-ननदोई) जेल सुपरिंटेंडेंट (मेरे जेठ) समझदार परिवार। स्थायी निवास — फरीदाबाद मेरे पति श्री अशोक कुमार सिन्हा इंजीनियर थे ( पांच वर्ष पूर्व देहान्त हो गया) भू जल विभाग से उच्चतम पद से सेवानिवृत्त हुए। दिल्ली और फरीदाबाद हेड ऑफ़िस था।शादी के बाद पहला तबादला अहमदाबाद हुआ फिर फरीदाबाद (1977) तब और अब के फरीदाबाद में ज़मीन-आसमान का अंतर आ गया है।केन्द्रीय कर्मचारी थे पूरे हिन्दुस्तान में बदली होती रही। हर राज्य का जायज़ा लिया। स्थायी निवास के लिए जयपुर या फरीदाबाद में रहने का मन बनाया। दिल्ली में नहीं लेकिन दिल्ली के नज़दीक रहने की तीव्र इच्छा थी।पता था नौकरी के अंतिम कुछ वर्ष प्रमोशन मिलने पर दिल्ली- फरीदाबाद ही रहना है। फिर यहाँ से बनारस और भागलपुर दोनों जगह पहुँचने में समय भी कम लगेगा। कुछ ऑफ़िस के लोग जो परिवार का हिस्सा बन गए थे फरीदाबाद में रह रहे थे उन्होंने भी ज़ोर डाला और हम आ गए फरीदाबाद।1990 में मकान बन गया किराए पर चढ़ गया। सरकारी लोन धीरे-धीरे चुकता होता रहा। सेवानिवृत्ति के बाद किराएदार चले गए ( पूरा मकान उनके पास था, बहुत अच्छे इंसान थे 14 साल रहे ) फिर हम आ गए 2005में । रिटायरमेंट से पहले की पोस्टिंग दिल्ली और फरीदाबाद की जवाबदारी सीनियर पोस्ट की। 2007 में वहीं से रिटायर हुए। मैंने भी B.H.U.की नौकरी से त्यागपत्र दे कर परिवार को प्रमुखता दी। लगभग पाँच साल बाद जब बेटा केन्द्रीय विद्यालय में जाने लगा पहली कक्षा में तो अहमदाबाद के ही एक कॉलेज में आवेदन दिया वहाँ से भी बुलावा आ गया। मिलने गई तो दूसरे दिन से ही join कर लीजिए कहा प्रिंसिपल ने। पहले तो यकीन नहीं हुआ पर ख़ुशी हुई। शायद शिक्षा,B.H.U.का अनुभव काम आया। वहाँ शुरू हो गया मेरा काम और कुछ ऐसा बनाव बना कि 9 साल तक किसी का कहीं भी तबादला नहीं हुआ। सरकारी खर्चे पर बचत के लिए ही। मेरे लिए वरदान बन गया। बेटा दसवीं में आ गया तब तबादले का ऑर्डर आया। तब मैं अहमदाबाद नहीं छोड़ पाई। बेटे को इंजीनियरिंग कॉलेज में भी वहीं प्रवेश मिल गया। बेटी दसवीं में आ गई। बस मैं वहीं स्थापित रही। पति महोदय तबादले पर कलकत्ता, जयपुर, वापस अहमदाबाद ,रायपुर घूमते रहे। हम सब गर्मी की छुट्टियों में उस राज्य और शहर में चले जाते घूम-फिर आते। इस तरह पूरा हिन्दुस्तान देख लिया। बेटे की शादी भी अहमदाबाद से की। आज भी मेरा एक बहुत बड़ा परिवार अहमदाबाद है यह कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। स्टाफ़, विद्यार्थी और अब साहित्यिक मंच के सदस्य एक वृहत गुजरात परिवार बनाए हुए हैं।अनेक बार पुस्तक समीक्षात्मक प्रस्तुति के लिए साहित्य सम्मान के लिए और विद्यार्थियों के रियूनियन कार्यक्रम के अनुरोध पर जाना होता रहता है। वहीं गुजरात विश्वविद्यालय से B.Ed., M.Ed.किया और gold medal प्राप्त किया। शिक्षकों की निबंध स्पर्धा में गुजरात राज्य स्तर का प्रथम पुरस्कार प्रख्यात अभिनेता श्री सुनील दत्त से लिया। Vibrant Gujrat कार्यक्रम में मेरे लिखे नाटक “ अनोखा फ़ैसला” का मंचन हुआ और प्रथम पुरस्कार मिला। दूरदर्शन पर मेरे द्वारा लिखा नाटक गुजराती में अनुवाद कर Telecast किया गया। हवामहल में भी एक संक्षिप्त नाटक सुनाया गया।( विद्यार्थियों की रिकॉर्डिंग हुई ) वहीं हमने Speak Sanskrit in seven days अभियान चलाया सफलतापूर्वक। बहुत काम किए। आनंदित हूँ कि इतना कुछ कर पाई। फरीदाबाद तो मेरे आध्यात्मिक व साहित्यिक जीवन के लिए वरदान ही बन गया। सेवानिवृत्ति के बाद जब अपने घर में रहने लगे तब भी हमारे किराएदार साथ रह रहे थे। उन्होंने ही एक परिवार ( पड़ोसी ) से परिचय कराया, मुझे साथ ले गईं, जहाँ हर मंगलवार कीर्तन होता था। मैं चली तो गई पर न कभी भजन में हिस्सा लिया था न बहुत शौक था मंदिर-मस्जिद जाने का। वहाँ महिलाएँ भजन गा रही थीं । एक ने मुझसे भी कहा मेरे पास तो कुछ भी नहीं था।दो मंगलवार गई और उन लोगों के हर बार भजन सुनाने का आग्रह करने से न सुना पाने की शर्म महसूस हुई और मैं पहला भजन सीधा-सादा लिख कर ले गई तीसरे मंगलवार और सुनाया। सब बड़े ख़ुश हुए। कुछ नया भजन था। वही सुना-सुनाया नहीं था। फिर क्या था माँ सरस्वती ने लाज रख ली। आज तीन पुस्तकें भजन की प्रकाशित हैं। एक भी भजन फिल्मी तर्ज़ पर नहीं। लगभग 1000 से ज़्यादा भजन लिख चुकी हूँ हर नवरात्रि पर तो खास नौ दिन अमेरिका से भी भजन लिख कर, गा कर भेजती हूँ। सेवानिवृत्ति के बाद भी फरीदाबाद में, निकट के एक स्कूल में NTT की कक्षाएं चलती थीं, सँभालने का आग्रह किया प्रिंसिपल ज्योति गुप्ता जी ने,इनकार न सकी और चार साल वहाँ भी सेवाएँ दीं। वहीं से साहित्यकारों से परिचय हुआ यद्यपि अहमदाबाद के एक प्रबुद्ध मंच से जुड़ी थी फिर भी यहाँ और विस्तार हो गया। यहाँ कमल कपूर जी, अंजु दुआ जैमिनी, सुदर्शन रत्नाकर जी से सम्पर्क हुआ। और भी अनेक साहित्यकारों और मंचों से जुड़ाव हुआ। महिला काव्य मंच फरीदाबाद ,की अध्यक्षता मिली।2017 में मंच की स्थापना ही हुई थी। तभी मैं भी जुड़ गई। 2018 में बेटी के पास सैन डिएगो कैलीफ़ॉर्निया, अमेरिका आना हुआ। यहाँ कई साहित्यकारों से परिचय हुआ और मन में विचार आया अपने मंच के विस्तार का। मंच के संस्थापक श्री नरेश गुप्ता ‘नाज’ जी से अनुमति माँगी तो वे बहुत ख़ुश हुए और पहली इकाई का मैंने यहीं सैन डिएगो में शुभारम्भ कर दिया। 20 जनवरी 2019 में। आज हम विदेश के 42 देशों में 86 इकाइयाँ स्थापित कर चुके हैं और अमेरिका में तो 23 इकाइयाँ कार्यरत हैं। मैं अब विदेश संरक्षक की हैसियत भूमिका निभा रही हूँ। परिवार बहुत बड़ा हो गया है। दो प्रवासी साझा संकलन भी मेरे सम्पादन में प्रकाशित हो गए। सभी ने सराहा। “ प्रवासी अमृतांजलि” “ प्रवासी भावाँजलि “ ( प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का यशोगान) आज अनेक साहित्यिक मंचों की संरक्षक हूँ। सविशेष *अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच *वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच *अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच *नारी अस्मिता मंच *हरियाणा लेखक मंच से मेरी रामायण आधारित पुस्तक “ ज्ञानांजलि “ का लोकार्पण हुआ। 2025 में। *लेखक गाँव देहरादून पूर्व मुख्यमंत्री डॉ० निशंक जी से सम्मानित होने का सुअवसर भी मिला। 2025 में “ विश्व हिन्दी परिषद् द्वारा अमेरिका की अध्यक्ष मनोनीत हुई । 2025 में। विज्ञान भवन में वक्ता के रूप में आमंत्रित और सम्मानित हुई। यह फरीदाबाद की ही देन कहूँगी। आज भी जहाँ भी सम्मान और पद प्राप्त हो रहा है वह माँ सरस्वती का वरदान समझ स्वीकारती हूँ। *15 अगस्त 2026 त्रिवेणी मंच से “ राष्ट्रप्रेमी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। फरीदाबाद का आस-पड़ोस सब मेरा परिवार है। भारत जाती हूँ तो पाँच महीना कब पंख लगा कर उड़ जाता है पता भी नहीं चलता। कीर्तन , काव्य संगोष्ठी और किट्टी पार्टी में समय बहुत आनंद के साथ बीतता है। घर पर मंचों की गोष्ठी, नवरात्रि में भजन संध्या,और किट्टी पार्टी का आयोजन ऊर्जा भर देता है। ईश्वर ने इतना विशाल परिवार दे रखा है कि फुर्सत ही नहीं मिलती। उसी में अपनी पुस्तकों का प्रकाशन भी हो रहा है। दो पुस्तकें प्रकाशन में गई हैं तीन की और तैयारी है। ज़िन्दगी दौड़ लगा रही है। फरीदाबाद की ही देन है कि सर्वप्रथम आते ही दिल्ली दूरदर्शन से मेरा साक्षात्कार और मेरी वार्ता ( मनोवैज्ञानिक ) प्रसारित हुई। पहला साक्षात्कार Pioneer group ने लिया उसके बाद तो अनेकों मंचों से साक्षात्कार लिए जा चुके हैं। online- offline बहुत सी बातें हैं।सीमित शब्दों में समेटना कठिन है। अमेरिका आना संयोग की बात है। कभी नहीं सोचा था न चाहा था। बेटी ने इंजीनियरिंग के बाद मास्टर्स अमेरिका से करना चाहा। यहाँ आई तो यहीं की हो गई। यहाँ की स्वच्छता, सुन्दरता, कार्यशैली ने प्रभावित किया। जो हमें भी आकर्षक लगी। भारत की तरह अच्छा काम करने वालों की टांग नहीं खींची जाती। काम का आनंद है यहाँ।कहते हुए दुःख होता है कि भारत में काम करने वालों को बेवकूफ समझा जाता है।मुझे भी बहुत सुनने को मिलता था। साथी यही कहते कि “मैडम क्यों करते हो इतना कोई गोल्ड मेडल नहीं मिलने वाला” मुझे लगता जो तनख़्वाह मिल रही है वह क्या कम है। हम दे क्या रहे हैं? कुछ नहीं। बच्चों के हित के लिए जितना किया जाए वह कम है। लेकिन काम न करके खुश रहने वाले अपने यहाँ अधिक हैं। यह सोच कर पीड़ा होती है।आज भी। मैंने अपने तरीके से बहुत काम किया और लोगों से करवाया भी। मन ही मन मुझे बुरा-भला कहने वाले मुँह पर मुझे मना नहीं कर पाते। करते भी थे। आज वहाँ भी सब extra गतिविधि बंद हो गई है। ठीक है। मैं पहली बार 2009 में बेटी का convocation attend करने आई। मेरे पति 1983 में सरकार की तरफ से पूरे विश्व का भ्रमण कर चुके थे। बिटिया ने हमें लगभग अमेरिका पूरा घुमा दिया। 2013 में दुबारा आई। फिर बेटी की शादी San Diego में हो गई। Reception attend करने 2014 में आई। फिर 2018 में तीन महीने के लिए आई तब “महिला काव्य मंच “की पहली इकाई की स्थापना की। 2021 में पति के देहान्त के बाद यहीं रह रही हूँ। भारत आती-जाती रहती हूँ। मैं अब यहाँ अपने तरीके से साहित्य सृजन कर रही हूँ।कुछ अच्छे सीनियर ग्रुप में शरीक होती हूँ। ई-बुक्स की जानकारी यह भी एक सुखद संयोग ही है। 2018 में मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुए और एक पुस्तक का मैंने सम्पादन किया। मेरी बेटी के दादा ससुर जी की लिखी पुस्तक थी उनकी जीवन यात्रा वृत्तान्त “ अपनी कहानी अपनी ज़ुबानी “ फिर मैं लिखती तो रही लेकिन प्रकाशन पर ध्यान कम रहा। मेरी एक परिचित का फ़ोन आया उन्होंने कहा कि एक साहित्यकार हैं उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है।उन्होंने आपकी किसी कार्यक्रम में प्रस्तुति सुनी है वे चाहती हैं कि उनकी रचनाओं को आप गा कर तैयार करें। मैं चकित कि मैं तो बहुत अच्छा नहीं गाती हूँ। संगीत का ज्ञान भी नहीं ,न ही गला बहुत अच्छा है। हाँ ख़ुश ज़रूर हुई कि किसी को मेरी आवाज़ पसंद आई है। मैंने हाँ कर दी। उनसे फ़ोन पर सम्पर्क हुआ। उन्होंने अपनी ग़ज़लें व नज़्म भेजे और मैंने कुछ रिकॉर्ड कर उन्हें भेज दिया।उन्होंने और भी कई लोगों से अलग-अलग रिकॉर्डिंग करवाई थी। बाद में एक दिन उनका फ़ोन आया कि “ पता है आपने मेरी 60 ग़ज़लें गा कर भेजी हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरी इस पुस्तक की सभी ग़ज़लें आपकी ही आवाज़ में जाएं। 101 ग़ज़लें हैं क्या आप गा देंगी? “ यह तो मेरे लिए आश्चर्यजनक ख़ुशी थी। इतने गाने मैं गा चुकी मुझे पता भी न चला। आवाज़ पसंद आ गयी यह भी मेरे लिए प्रसन्नता की बात थी।मैंने तो तुरंत हाँ कर दिया। दूसरे लोगों की आवाज़ भी अच्छी थी वाद्ययंत्र भी था। मेरा तो बस मेरा गला ही था। पर चलो उन्हें पसंद था तो मुझे क्या दिक्कत थी। बाद में उन्होंने बताया कि आपकी उच्चारण की स्पष्टता कमाल की है ख़ासकर उर्दू के शब्द “ Ok फिर एक दिन फोन आया और उन्होंने कहा कि “आप भी तो ग़ज़ल लिखती हैं, अपनी ग़ज़लें रिकॉर्ड कीजिए ई-बुक बनवाइए।” मैंने कहा "अरे नहीं अब क्या करना है” पर वे नहीं मानी और ज़िद ले बैठीं कि मैं प्रकाशित करवाऊँगी। उन्हीं की प्रेरणा से जो ढेर सारा अलग-अलग लिखा रखा था इधर-उधर ,(मैंने उसे समेटा और एक ग़ज़ल, एक भजन , एक देशभक्ति मुक्तक संग्रह यहाँ तक कि एक लघुकथा संग्रह भी ( कुछ लघुकथाएँ मेरी आवाज़ में) चार पुस्तकें एक साथ e-audio book के रूप में प्रकाशित हुईं।यह डॉ० मुक्ता जी की प्रेरणा और प्रोत्साहन का परिणाम रहा। मैं आजीवन ऋणी रहूँगी। मैं बाद में मिली उनसे अब हम बहुत घनिष्ठ मित्र हैं। उनके ही पुस्तक की समीक्षा लिखने के लिए उन्होंने कहा। मैंने विस्तृत समीक्षा लिखी।उन्होंने जहाँ -जहाँ भेजा,प्रकाशित किया लोगों ने बहुत सराहना की।उन्होंने लोगों की प्रशंसात्मक टिप्पणी मुझे पढ़वाया तो मैंने उन्हें बताया कि मैं तो जो भी पुस्तक पढ़ती हूँ प्रतिक्रिया जरूर लिखती हूँ।उन्होंने पूछा कितनी होंगी? मैंने कहा देख कर बताती हूँ लिख कर उन्हें भेज देती हूँ।2005 से लिख रही हूँ। बाद में मैंने फाइल में देखा (तब मोबाइल कहाँ था, कागज पर लिखते कॉपी करा के जेरोक्स कर कागज की एक कॉपी लेखक को भेज देती।परिचित ही होते थे। तब अहमदाबाद साहित्यिक मंच के लेखकों की पुस्तकें थीं। मैंने गिना संख्या 93 थी जब मुक्ता जी को बताया तो उन्होंने कहा कि समीक्षा संग्रह छपवा दीजिए। और एक समीक्षा संग्रह “ जीवन मित्र “ भी आ गया। इसी तरह एक अमेरिका के मंच से “रामायण क्वीज़ “ में भाग लिया था। पूरे रामायण से हज़ार से ज़्यादा प्रश्न ढूँढ़ निकाले थे। उसे भी व्यवस्थित लिख कर छपने के लिए दे दिया। इसी तरह लगभग 6 वर्षों से “ दैनिक हरियाणा प्रदीप” समाचार पत्र के स्थायी स्तम्भ में प्रतिदिन मेरा एक देशभक्ति मुक्तक छपता है उसे भी एकत्रित कर प्रकाशित करवा दिया । अब देशभक्ति मुक्तक संग्रह और समीक्षा संग्रह का भाग-दो छपने गया है। यह मित्रों के प्रोत्साहन का परिणाम है। ईश्वर की कृपा और मुक्ता जी की प्रेरणा से सब हो रहा है। मैं तो बहुत आलसी हूँ प्रकाशन के मामले में। लिखती तो खूब हूँ। देशभक्ति गीत ( विद्यार्थियों और अपने बच्चों के लिए ) लिखना प्रारम्भ किया आज भी अच्छा लगता है लिखना। शायद इसीलिए प्रतिदिन एक मुक्तक लिख कर भेज पा रही हूँ। ग़ज़ल लिखना प्रिय है सीख रही हूँ। हर विधा में लिखने की कोशिश की है। वैश्विक हिन्दी संस्थान ह्युस्टन की सदस्य हूँ। अब सम्पादक मंडल में हूँ। सर्वप्रथम हाइकु संग्रह में सम्मिलित होने के लिए हाइकु लिखे। online कार्यक्रम में जब अपने हाइकु की गा तर प्रस्तुति दी तो सभी हतप्रभ कि हाइकु को कैसे आपने गा कर पेश किया। हाइकु संग्रह भी आ सकता है इतने हाइकु तैयार हैं।लघुकथा संग्रह का सम्पादन कार्य भी किया । लघु कविता भी लिखी,दोहे कुंडलिया, घनाक्षरी । पसंदगी में ग़ज़ल, गीत कविता,दोहे अच्छे लगते हैं। छंदमुक्त बहुत कम लिखती हूँ लेकिन हाथ आज़माया उधर भी है। लिखती हूँ कभी-कभी। पुस्तक लायक तो अभी भी नहीं होगी। भजन, ग़ज़ल गीत लिखना पसंद है। अतीत की विरासत में तो शरतचंद्र, निराला ,प्रसाद दिनकर, महादेवी, सुभद्रा कुमारी चौहान, प्रेमचंद, पसंद आते थे आधुनिक में- ओम पवार, विष्णु सक्सेना,कुमार विश्वास मैं स्वयं अपनी रचनाओं को भी बहुत पसंद करती हूँ।कुछ रचनाएँ तो हर किसी की विलक्षण लिख ही जाती हैं। आज के युवाओं की रचनाएँ भी कुछ तो इतनी अच्छी होती हैं कि मैं तो उन्हें वर्तमान में पंत, प्रसाद,महादेवी के समकक्ष पाती हूँ। हर युग की संकल्पना भिन्न है , व्यवस्था और आवश्यकता भिन्न है साहित्य भी उसी के इर्द -गिर्द चलता है। आज भी ओज कविताएँ लिखने वाला हर कवि पसंद आता है। मैं व्यंग्य समूह से भी जुड़ी हुई हूँ। कटाक्ष, टीका-टिप्पणी करना, छिद्रान्वेषण मेरी वृत्ति नहीं फिर भी व्यवस्था सुधार हेतु विसंगतियों को उजागर करने की ज़रूरत भी है यह मान कर व्यंग्य भी लिखती हूँ लेकिन बहुत कम। परसाई जी बहुत पसंद आते हैं। सोशल मीडिया के बहुत कम मंचों पर सक्रिय हूँ। Fb के कुछ साहित्यिक मंचों पर विषयानुसार लिखना सीखने के उद्देश्य से सक्रिय हूँ। *Story mirror *लघुकथा के परिंदे ( यहीं से लघुकथाएं लिखने के विषय मिले और खूब लघुकथाएँ लिखीं।) *नया लेखन-नए दस्तखत लघुकथा हेतु *सोपान *कलम बोलती है आज भी देखती हूँ । कोई विषय पसंद आता है। चुनौती जैसा लगता है लिखना तो ज़रूर लिखती।