आज की नारी और उसके जीवन के नये आयाम

सुश्री सुषमा मैत्री
आधुनिक समाज की नारी।
समय बदल रहा है और उसके साथ नारी की भूमिका भी बदल रही है। कभी नारी की पहचान घर की चारदीवारी, परिवार और रिश्तों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन आज वही नारी शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, राजनीति, कला, विज्ञान और सामाजिक नेतृत्व के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। आधुनिक नारी केवल परिस्थितियों को स्वीकार करने वाली नहीं, बल्कि परिस्थितियों को बदलने का साहस रखने वाली नारी है।
अपनी पहचान की तलाश।
आज की नारी चाहती है कि उसे केवल किसी की बेटी, पत्नी, बहू या माँ के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में भी पहचाना जाए।
वह अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती है। वह अपने सपनों को जीना चाहती है और अपने जीवन की दिशा तय करने का अधिकार रखती है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ परिवार और समाज से दूरी बनाना नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता वह है जिसमें नारी अपने रिश्तों को सम्मान देते हुए भी अपनी पहचान को खोने न दे।
आधुनिकता केवल पहनावे का नाम नहीं।
समाज में आज भी नारी की आधुनिकता को अक्सर उसके कपड़ों, रहन-सहन और सोशल मीडिया की तस्वीरों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन आधुनिक नारी की पहचान उसके पहनावे से अधिक उसकी सोच, आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने की क्षमता और आत्मसम्मान से होती है।
वह साड़ी पहने या जींस, घर संभाले या कार्यालय जाए, सोशल मीडिया पर सक्रिय हो या उससे दूर रहे—उसकी आधुनिकता का निर्णय समाज को नहीं, उसके व्यक्तित्व को करना चाहिए।
पुरुष समाज की बदलती भूमिका।
आधुनिक समाज में नारी की स्वतंत्रता के साथ पुरुष की सोच में बदलाव भी आवश्यक है। नारी को आगे बढ़ने के लिए पुरुष से प्रतिस्पर्धा नहीं, समान अवसर और सम्मान चाहिए। एक पुरुष जब अपनी पत्नी की सफलता को अपनी हार नहीं समझता, बेटी के सपनों को बेटे के सपनों जितना महत्व देता है और महिला की 'ना' को 'ना' ही समझता है, तभी समाज वास्तव में आधुनिक बनता है।
सोशल मीडिया और नारी।
सोशल मीडिया ने महिलाओं को अपनी आवाज़ रखने का एक बड़ा मंच दिया है। आज महिला अपनी कविता, विचार, कला, अनुभव, तस्वीर और जीवन-दृष्टि दुनिया के सामने रख सकती है। लेकिन इसी मंच पर उसे अनावश्यक टिप्पणियों, चरित्र-निर्णय और व्यक्तिगत हस्तक्षेप का सामना भी करना पड़ता है। किसी महिला की तस्वीर देखकर उसके चरित्र का अनुमान लगाना या उसकी मित्रता को किसी और रिश्ते का संकेत समझना आधुनिकता नहीं, बल्कि पुरानी मानसिकता का डिजिटल रूप है।
संघर्ष अभी बाकी है।
कानून और शिक्षा ने महिलाओं को अनेक अधिकार दिए हैं, लेकिन केवल अधिकार मिल जाना पर्याप्त नहीं है। समाज की सोच बदलना भी उतना ही जरूरी है। आज भी अनेक महिलाएँ अपने निर्णयों के लिए परिवार, रिश्तेदारों और समाज के सवालों का सामना करती हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे हर भूमिका में पूर्ण हों—अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी, अच्छी बहू, अच्छी माँ और साथ ही सफल पेशेवर। लेकिन पुरुषों से ऐसी पूर्णता की अपेक्षा अक्सर उसी कठोरता से नहीं की जाती।
इस असमान अपेक्षा को बदलना होगा।
नारी को देवी नहीं, इंसान समझिए
नारी को कभी देवी बनाकर pedestal पर रखा जाता है और कभी उसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ उसके वास्तविक मानवीय अधिकारों को नजरअंदाज कर सकती हैं।
नारी को देवी बनाने की आवश्यकता नहीं है।
उसे इंसान समझने की आवश्यकता है।
उसे भी गलती करने, सीखने, असफल होने, दोबारा शुरुआत करने, अपनी पसंद चुनने और अपने जीवन का निर्णय लेने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुष को।
आधुनिक समाज की नारी केवल बदलते समय की तस्वीर नहीं है, वह बदलते समाज की निर्माता भी है। उसकी उड़ान को रोकने के बजाय उसे आकाश दीजिए। उसकी आवाज़ को दबाने के बजाय उसे सुनिए। उसके निर्णयों पर संदेह करने के बजाय उसके व्यक्तित्व पर विश्वास कीजिए।
क्योंकि जिस समाज में नारी स्वतंत्र होकर सोच सकती है, सुरक्षित होकर जी सकती है और सम्मान के साथ अपनी पहचान बना सकती है—वही समाज वास्तव में आधुनिक कहलाने योग्य है।
नारी को बदलने की नहीं,
नारी को समझने की जरूरत है।
क्योंकि नारी बदलेगी तो केवल उसका जीवन नहीं,
पूरे समाज की सोच बदलेगी।
