साहित्य सृजन संवाद

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कविता

सुख -दुःख की छाया

राजीव कुमार झा

राजीव कुमार झा

कविता माटी की मूरत! राजीव कुमार झा जन्म और मृत्यु की माया इसमें दस्तक देती रहती सुख - दुख की सुंदर छाया। जीवन में आनंद और उल्लास पीड़ा और व्यथा में भी रोज सूरज उगता लेकर आस। पथ पर घनघोर अंधेरा फैला अब आंधी पानी धूप छांव में धरती का रंग बना मटमैला। आलोकित हंसता रहता आकाश फूलों से खुशबू लेकर यहां महकती रहती माटी की सांस। सदैव यहां कभी कोई रहता अपना होकर दिल के पास। यह रूठा मन अब घर में भरमाता अंधकार में उत्ताल तरंगों से प्रमुदित सागर सपनों के आंगन में लहराता जिंदगी के हरे भरे बाग बगीचों में धरती पर सबकी हार -जीत के गीत सुनाता। चंदा उसी पहर आकर गहन रात के पथ पर मुस्काता। बंधु! सचमुच श्रम बूंदों से मानव यहां माटी का मोल चुकाता । मृत्युशैया के पास उसे देखकर फिर कोई आकर शीश नवाता। धन्य धन्य...यह जीवन अपना इसकी सच्चाई बाल वृंद को संध्या के आंगन में आकर कहना। जीवन सौर मंडल में धरती का नैसर्गिक निनाद है, सितारों के नीरव प्रकाश में ईश्वर! सतत् सबके आसपास है!