सागरतट

राजीव कुमार झा

कविता
सागरतट
संसार की स्वामिनी
जगत् की दामिनी
सप्तस्वरों से आलोकित
वसुंधरा की रागिनी।
प्रात काल की
पावन बेला में
दूर गगन से आकर
धरती पर बिखरी
जीवन की पावन
ज्योति
सागरतट पर बिखरे हैं,
मानो प्रेम के
उज्जवल मोती।
तुम सगुणा
अध्यात्म भाव व्यंजना
चन्द्रकिरण से
आकाश का
हृदय हार गूंथती
नदी की बहती धार में
इठलाती मौन स्मित
प्रार्थना
संसार की
अपनी कृपा से
परिपूर्ण करती
सबके ह्रदय की
चिरसंचित कामना

