साहित्य सृजन संवाद

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कविता

प्रतिमा यादव: गोरखपुर की कवयित्री

प्रस्तुति: राजीव कुमार झा

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प्रतिमा यादव (पंखुड़ी) की दो बाल कविताएं फौजी चाचा दीपू के घर फौजी चाचा आएं। संग में अपने मिठाई और खिलौने ले आए। खाकी वर्दी पहने कंधे पर लटक रहा बंदूक। दुश्मन पर फायर करें निशाना इनका बड़ा अचूक। सीमा पर सजग प्रहरी बने रहते। हम सबको बहादुरी की बातें बताते। जंग छिड़ती जब दुश्मनों से कैसे तोपें आग उगलती। रक्षा करते फौजी मां भारती की। फौजी चाचा है बड़े निराले। मस्त मतवाले है यह हिम्मत वालें। दुश्मनों के छक्के छुड़ाते। जय हिंद के नारे लगाते। फौजी चाचा से हम बहुत कुछ सीखते। आदर्श वादी प्रेरणा लेते। नि: स्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करते। *मेरी प्यारी गुड़िया रानी* मेरी प्यारी गुड़िया रानी। देखो लगती कितनी सयानी। ठाट बाट से यह रहती सुनहरे गोटेदार फ्रॉक पहनती। लेकर कंघी मैं इसके बाल बनाती नीली- नीली गोल आंखों से हमसे बतियाती। छोटी बिंदी मै इसके माथे पर लगाती। लहंगा पहना कर मैं इसको दुल्हन बनाती। मम्मी के बनाए पकवान मैं इसको खिलाती। थपकी देकर कभी मैं इसको सुलाती। लेकर हाथ में पर्स मेरी गुड़िया जाती ब्यूटी पार्लर। फेशियल करवाती और करवाती हेयर कलर। गुड्डे राजा भी पहनकर मस्त शेरवानी राह निहारे बैठकर सजी दुल्हन गुड़िया रानी। गुड्डे राजा संग गुड़िया रानी ब्याही जाती। दहेज में फ्रिज कूलर ढेरों सामान अपने संग ले जाती। सिसक सिसक कर खूब रोती हमारी गुड़िया रानी। विदाई के मौसम में आ जाता सबके आंखों में पानी। *गोरखपुर*